महाकुंभ! एक ऐसा आयोजन जिसमें आस्था अपनी पराकाष्ठा पर खड़ी थी। एक ऐसा महापर्व जो भूतो न भविष्यति का दर्जा रखता था। लोग संगम में डुबकी लगाने के लिए टूटे पड़े थे। सबकुछ बहुत ही सुचारू रूप से चल रहा था, सरकार और प्रशासन दोनों अपनी तरफ से पूरी सावधानी बरत रहे थे। तभी 28-29 जनवरी की दरम्यानी रात कुछ ऐसा घटित हो गया जिसने पूरे भारतवर्ष को गहरे शोक में डाल दिया। साठ श्रद्धालु घायल, तीस की मौत और अफवाहों का बाजार गर्म। जितने मुंह उतनी बातें, कुछ तर्क संगत तो कुछ अनर्गल, फिर जल्दी ही ये पर्व एक ऐसा सुलगता हुआ तंदूर बन गया जिसपर हर कोई अपनी रोटियां सेंकने में जुट चुका था। कोई खामियां गिना रहा था तो कोई वाहवाही लूट रहा था। मगर इन सबसे परे कोई ऐसा भी था जो एक षड़यंत्र रच रहा था।
एक ऐसा षड़यंत्र जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।
विशेष नोट : इस पुस्तक का महाकुंभ आयोजन से कोई संबंध नहीं है।
उपन्यास की कहानी, सुप्रसिद्ध अपराध कथा लेखक संतोष पाठक की कलम से निकली एक विशुद्ध मर्डर मिस्ट्री है। अतः किताब को तभी पढ़ें जब आपको दिमाग हिला देने वाली, सस्पेंस से लबरेज कहानियाँ पसंद हों।


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