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By: Santosh Pathak
एडवोकेट आंनद सलूजा पांच दिनों बाद पटना से दिल्ली वापिस लौटा तो उसकी दुनिया बदल चुकी थी, बल्कि उजड़ चुकी थी। ये जानकर तो उसके पैरों तले जमीन ही खिसक गयी कि उसकी लाश का पोस्टमॉर्टम तक कराया जा चुका था। प्रत्यक्षतः उस मामले से मेरा कोई लेना देना नहीं था क्योंकि मेरी क्लाइंट अंतरा नाम की एक महिला थी जिसका पति शरद कपूर दस दिनों से गायब था, ना कि एडवोकेट आनंद सलूजा। मगर जल्दी ही मुझे दोनों मामले आपस में कनैक्टेड दिखाई देने लगे क्योंकि शरद कपूर और आनंद सलूजा ना सिर्फ एक ही पेशे में थे, बल्कि दोनों के बीच गहरी दोस्ती भी थी।
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