कॉलगर्ल का आत्मसम्मान
रजनी बेहद आकर्षक व्यक्तित्व की युवती थी। बड़ी-बड़ी आँखें, सहज मुस्कान और आत्मविश्वास से भरा उसका व्यक्तित्व लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता था। लोगों की निगाहों में बने रहना उसके पेशे की मजबूरी भी था और आदत भी।
उस रात घड़ी ने दस बजने का संकेत दिया तो उसने अनायास ही कलाई घड़ी पर नजर डाली। समय देखकर उसके भीतर एक अजीब-सी बेचैनी जाग उठी। ऐसा नहीं था कि वह पहली बार देर रात बाहर थी, लेकिन उस दिन न जाने क्यों मन आशंकाओं से घिरता जा रहा था।
उसने चारों ओर नजर दौड़ाई।
बस स्टॉप लगभग खाली हो चुका था। कुछ दुकानदार अपना सामान समेट रहे थे। दो-चार यात्री अपनी-अपनी मंजिलों की प्रतीक्षा कर रहे थे। भीड़ के बीच होते हुए भी रजनी स्वयं को अकेला महसूस कर रही थी।
उसे हमेशा लगता था कि एक लड़की होने के साथ कुछ अदृश्य खतरे भी जुड़े होते हैं। राह चलते लोगों की उत्सुक निगाहें, बिना वजह बातचीत की कोशिशें और अनावश्यक नजदीकियाँ—वह इन सबसे अपरिचित नहीं थी। वर्षों के अनुभव ने उसे लोगों की नीयत पहचानना सिखा दिया था।
पिछले एक घंटे से वह बस की प्रतीक्षा कर रही थी।
कभी सड़क की ओर देखती, कभी घड़ी की ओर।
बस का कहीं पता नहीं था।
तभी उसका मोबाइल बज उठा।
स्क्रीन पर एक परिचित नाम चमका।
उसने कॉल रिसीव की।
“कहाँ हो?” दूसरी तरफ से बेसब्री भरी आवाज आई।
“रास्ते में हूँ,” रजनी ने संक्षिप्त उत्तर दिया।
“जल्दी आओ।”
“थोड़ी देर और लगेगी।”
इसके बाद उसने कॉल समाप्त कर दी।
फोन जेब में रखते हुए उसने लंबी साँस ली।
उसे नहीं मालूम था कि यह रात उसकी जिंदगी की दिशा बदलने वाली है।
कुछ देर बाद बस आई।
बस लगभग भरी हुई थी।
रजनी ने भीतर प्रवेश कर एक खाली सीट देखी और बैठ गई।
बस धीरे-धीरे अपनी मंजिल की ओर बढ़ने लगी।
दरियागंज बस स्टॉप पर बस कुछ क्षणों के लिए रुकी।
तभी एक युवक तेजी से दौड़ता हुआ बस की ओर आया।
लग रहा था जैसे वह किसी भी कीमत पर यह बस नहीं छोड़ना चाहता।
कुछ यात्रियों ने उसकी ओर देखा।
ड्राइवर ने नाराजगी जाहिर की।
लेकिन युवक आखिरकार बस में चढ़ ही गया।
बस चल पड़ी।
युवक यात्रियों के बीच से रास्ता बनाता हुआ आगे आया और रजनी के बगल वाली सीट पर बैठ गया।
उसने बैठते समय विनम्रता से “सॉरी” कहा और स्वयं को सीट के किनारे तक समेट लिया।
यह बात रजनी को थोड़ी अजीब लगी।
आमतौर पर लोग उसके बगल में बैठते ही बातचीत शुरू करने की कोशिश करते थे।
लेकिन यह युवक अलग था।
वह खिड़की के बाहर देखता रहा, मानो उसके आसपास कोई मौजूद ही न हो।
कुछ मिनट बीत गए।
रजनी ने चुपके से उसकी ओर देखा।
साधारण कपड़े।
शांत चेहरा।
और आँखों में एक अजीब-सी गंभीरता।
उसे लगा शायद वह किसी गहरी सोच में डूबा हुआ है।
लेकिन जो बात उसे सबसे ज्यादा विचलित कर रही थी, वह थी युवक की उदासीनता।
पहली बार किसी पुरुष ने उसकी मौजूदगी को इतना सामान्य ढंग से लिया था।
और यही बात उसे बार-बार उस युवक की ओर देखने को मजबूर कर रही थी।
बस अपनी गति से आगे बढ़ रही थी।
रजनी बार-बार स्वयं को समझाने की कोशिश कर रही थी कि उसके बगल में बैठा युवक भी अन्य यात्रियों की तरह एक साधारण मुसाफिर भर है, लेकिन उसका मन मानने को तैयार नहीं था।
आमतौर पर लोग उससे बातचीत करने का अवसर तलाशते थे।
कोई मुस्कुरा देता।
कोई रास्ता पूछने के बहाने बात शुरू कर देता।
कोई उसकी ओर बार-बार देखता।
लेकिन यह युवक जैसे किसी दूसरी ही दुनिया में खोया हुआ था।
उसे इस बात की परवाह ही नहीं थी कि उसके बगल में कौन बैठा है।
यही उदासीनता रजनी को बेचैन कर रही थी।
कुछ देर बाद उसने साहस जुटाकर कहा—
“एक्सक्यूज़ मी।”
युवक ने तुरंत उसकी ओर देखा।
“जी?”
“टाइम क्या हुआ है?”
युवक ने घड़ी देखी।
“पौने ग्यारह।”
“ओह… धन्यवाद।”
“कोई बात नहीं।”
संवाद यहीं समाप्त हो गया।
युवक फिर बाहर देखने लगा।
रजनी के भीतर एक अजीब-सी खीझ पैदा हुई।
उसे लगा जैसे उसने बातचीत का दरवाज़ा खोला और सामने वाले ने विनम्रता से उसे फिर बंद कर दिया।
उसने खिड़की के बाहर देखने की कोशिश की।
सड़क किनारे भागती रोशनियाँ, बंद होती दुकानें और रात की ठंडी हवा।
लेकिन उसका ध्यान बार-बार युवक की तरफ लौट आता।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि आकर्षण हमेशा सुंदरता से पैदा नहीं होता।
कई बार किसी की अनदेखी भी हमें उसकी ओर खींचने लगती है।
कुछ मिनट बाद उसने फिर कोशिश की।
“सुनिए।”
युवक ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा।
“जी?”
“आप रोज़ इसी बस से आते हैं क्या?”
“अक्सर।”
“ओह।”
फिर कुछ क्षण की चुप्पी।
“और आप?”
“मैं भी।”
युवक ने सिर हिलाया।
फिर दोनों चुप हो गए।
रजनी को अपने ऊपर आश्चर्य हो रहा था।
एक अनजान आदमी से बात करने के लिए वह इतनी उत्सुक पहले कभी नहीं हुई थी।
लेकिन शायद कारण युवक नहीं था।
कारण था उसका व्यवहार।
वह रजनी को प्रभावित करने की कोशिश नहीं कर रहा था।
न उसके बारे में कुछ जानने की उत्सुकता दिखा रहा था।
न कोई अनावश्यक मुस्कान।
न कोई बनावटी शिष्टाचार।
वह बस सामान्य था।
और यही सामान्यता रजनी के लिए असामान्य थी।
कुछ देर बाद युवक ने स्वयं पूछा—
“आप कहीं काम करती हैं?”
प्रश्न सुनकर रजनी कुछ क्षण चुप रही।
वह झूठ बोल सकती थी।
हमेशा की तरह कोई बनावटी परिचय दे सकती थी।
लेकिन न जाने क्यों ऐसा करने का मन नहीं हुआ।
“हाँ… काम करती हूँ।”
“कहाँ?”
रजनी मुस्कुराई।
“यह थोड़ा मुश्किल सवाल है।”
युवक भी मुस्कुरा दिया।
“ठीक है, जवाब मत दीजिए।”
“और आप?”
“एक प्राइवेट कंपनी में अकाउंट मैनेजर हूँ।”
“अच्छा।”
“नाम आशीष कुमार।”
रजनी ने पहली बार खुलकर उसकी ओर देखा।
“मैं रजनी हूँ।”
अब बातचीत धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।
विषय साधारण थे।
नौकरी।
दिल्ली की भागदौड़।
महंगाई।
सफर की परेशानियाँ।
लेकिन इन साधारण बातों में भी रजनी को एक अजीब-सा सुकून मिल रहा था।
बहुत दिनों बाद कोई उससे बिना किसी स्वार्थ के बात कर रहा था।
बिना किसी अपेक्षा के।
बिना किसी लालच के।
बातों-बातों में आशीष ने कहा—
“दिलचस्प बात है।”
“क्या?”
“आपको देखकर लगा था कि आप बहुत आत्मविश्वासी हैं।”
“तो?”
“लेकिन अब लग रहा है कि आप अंदर से बहुत परेशान हैं।”
रजनी चौंक गई।
उसने कभी नहीं सोचा था कि कोई अजनबी इतनी जल्दी उसके भीतर झाँक लेगा।
“ऐसा क्यों लगा आपको?”
आशीष कुछ क्षण सोचता रहा।
फिर बोला—
“क्योंकि खुश लोग अपने बारे में इतना नहीं सोचते जितना दुखी लोग सोचते हैं।”
यह सुनकर रजनी चुप हो गई।
उसे लगा जैसे किसी ने उसके भीतर छिपे किसी पुराने घाव को छू लिया हो।
बस अपनी मंज़िल की ओर बढ़ती रही।
लेकिन रजनी को लग रहा था कि वह किसी और यात्रा पर निकल चुकी है।
एक ऐसी यात्रा, जो उसे पहली बार अपने ही भीतर ले जा रही थी।
और शायद पहली बार उसे अपने जीवन के बारे में गंभीरता से सोचने पर मजबूर कर रही थी।
उस रात जब रजनी अपने फ्लैट पर पहुँची तो आधी रात बीत चुकी थी।
आमतौर पर घर लौटते ही वह थकान से चूर होकर बिस्तर पर गिर पड़ती थी। लेकिन उस रात ऐसा नहीं हुआ।
कमरे में प्रवेश करते ही उसने पर्स मेज पर रखा और बिना कपड़े बदले खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई।
नीचे सड़क पर इक्का-दुक्का गाड़ियाँ गुजर रही थीं।
दूर किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज आ रही थी।
बाकी सब कुछ शांत था।
लेकिन उसके भीतर जैसे तूफान मचा हुआ था।
आशीष से हुई बातचीत बार-बार उसके दिमाग में घूम रही थी।
“आप अंदर से बहुत परेशान हैं।”
सिर्फ एक वाक्य।
लेकिन जैसे किसी ने उसके मन का बंद दरवाज़ा खोल दिया हो।
वर्षों बाद किसी ने उसके चेहरे से आगे बढ़कर उसके भीतर झाँकने की कोशिश की थी।
रजनी धीरे-धीरे बिस्तर पर बैठ गई।
उसने अपने जीवन के बारे में सोचना शुरू किया।
कब आखिरी बार किसी ने उससे बिना किसी स्वार्थ के बात की थी?
कब किसी ने उसके चेहरे से ज्यादा उसके मन में रुचि दिखाई थी?
कब किसी ने उससे यह जानना चाहा था कि वह खुश है या नहीं?
उसे याद नहीं आया।
पिछले कई वर्षों में उसकी दुनिया कुछ निश्चित चेहरों तक सीमित होकर रह गई थी।
ग्राहक।
दलाल।
होटल वाले।
फोन करने वाले लोग।
हर कोई उससे कुछ चाहता था।
लेकिन कोई उसे जानना नहीं चाहता था।
कोई यह नहीं पूछता था कि उसके सपने क्या हैं।
उसकी परेशानियाँ क्या हैं।
उसे किस बात से खुशी मिलती है।
आशीष अलग था।
बहुत अलग।
और शायद यही बात उसे बार-बार उसकी ओर खींच रही थी।
रात के लगभग दो बज चुके थे।
नींद अब भी उसकी आँखों से कोसों दूर थी।
वह उठी और आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई।
कुछ देर तक स्वयं को देखती रही।
पहली बार उसे लगा कि वह खुद को वर्षों से गलत तरीके से देखती रही है।
वह हमेशा अपने चेहरे को देखती रही।
अपने कपड़ों को।
अपने बाहरी व्यक्तित्व को।
लेकिन कभी अपने भीतर झाँकने की कोशिश नहीं की।
“मैं आखिर हूँ कौन?”
अचानक यह प्रश्न उसके मन में उभरा।
और पहली बार उसके पास इसका उत्तर नहीं था।
सुबह होने तक वह लगभग जागती रही।
कई बार उसने आँखें बंद कीं।
कई बार करवट बदली।
लेकिन हर बार उसके सामने वही चेहरा आ खड़ा होता।
शांत।
संयमित।
और बिना किसी बनावट के मुस्कुराता हुआ।
अगले दिन शाम होते-होते रजनी फिर उसी बस स्टॉप पर पहुँच गई।
आज वह सामान्य दिनों की तरह नहीं आई थी।
आज उसके भीतर एक अजीब-सी उत्सुकता थी।
वह स्वयं से लाख कह रही थी कि वह सिर्फ बस का इंतजार कर रही है।
लेकिन सच यह था कि वह किसी और का इंतजार कर रही थी।
हर आती-जाती बस पर उसकी नजर चली जाती।
हर बार उसे लगता शायद आशीष दिखाई दे जाए।
लेकिन वह नहीं आया।
पंद्रह मिनट बीत गए।
फिर आधा घंटा।
फिर एक घंटा।
धीरे-धीरे उसके भीतर निराशा घर करने लगी।
शायद वह आज नहीं आएगा।
शायद वह किसी और रास्ते से चला गया होगा।
शायद उसे याद भी न हो कि कल बस में उसकी किसी लड़की से बातचीत हुई थी।
यह सोचकर उसके भीतर एक अजीब-सी खालीपन उतर आया।
उसे स्वयं पर हँसी भी आई।
वह एक ऐसे आदमी के बारे में सोच रही थी जिससे उसकी मुलाकात मुश्किल से आधे घंटे की थी।
लेकिन दिल तर्क नहीं समझता।
वह अपनी ही दिशा में चलता है।
उसी समय उसका मोबाइल फोन बज उठा।
स्क्रीन पर एक परिचित नंबर चमक रहा था।
रजनी ने कुछ क्षण फोन को देखा।
फिर कॉल रिसीव कर ली।
दूसरी तरफ से वही पुरानी आवाज थी।
वही पुराना आग्रह।
वही पुरानी मांग।
लेकिन आज कुछ बदल चुका था।
बहुत कुछ बदल चुका था।
और सबसे ज्यादा बदली थी रजनी।
उसने पहली बार महसूस किया कि उसके भीतर कोई नई शक्ति जन्म ले रही है।
एक ऐसी शक्ति जो उसे उसके पुराने जीवन से दूर ले जाना चाहती थी।
उसने फोन कान से हटाया।
कुछ क्षण स्क्रीन को देखा।
और फिर दृढ़ स्वर में बोली—
“मुझे माफ़ कीजिए… अब मैं यह काम नहीं करूँगी।”
दूसरी तरफ कुछ कहा गया।
लेकिन इस बार उसने सुनना जरूरी नहीं समझा।
उसने कॉल काट दी।
और बहुत देर तक मोबाइल को अपने हाथ में थामे खड़ी रही।
उसे लग रहा था जैसे उसने वर्षों बाद पहली बार अपने लिए कोई फैसला लिया हो।
एक ऐसा फैसला जिसमें पैसे नहीं थे।
डर नहीं था।
सिर्फ आत्मसम्मान था।
कॉलगर्ल का आत्मसम्मान
आगे…
फोन काटने के बाद रजनी काफी देर तक वहीं खड़ी रही।
उसके हाथ कांप रहे थे।
दिल की धड़कनें तेज थीं।
लेकिन भीतर कहीं एक अजीब-सा सुकून भी था।
शायद इसलिए कि वर्षों बाद उसने कोई निर्णय अपनी इच्छा से लिया था।
ऐसा निर्णय जिसमें लालच नहीं था, मजबूरी नहीं थी, सिर्फ आत्मसम्मान था।
उस रात उसने अपना मोबाइल बंद कर दिया।
कुछ देर बाद फिर चालू किया।
कई मिस्ड कॉल दिखाई दीं।
कुछ पुराने ग्राहकों की।
कुछ ऐसे लोगों की जिनसे उसका कामकाजी संबंध था।
कुछ देर तक वह स्क्रीन को देखती रही।
फिर एक-एक करके कई नंबर डिलीट करने लगी।
उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह केवल नंबर नहीं मिटा रही, बल्कि अपने अतीत के धुंधले अध्याय बंद कर रही हो।
अगले कुछ दिन उसके लिए बेहद कठिन रहे।
उसकी आमदनी लगभग बंद हो चुकी थी।
बैंक खाते में ज्यादा पैसे नहीं थे।
फ्लैट का किराया देना था।
खर्चे थे।
और सबसे बड़ी बात—भविष्य पूरी तरह अनिश्चित था।
कई बार उसका मन डगमगाया।
कई बार उसने सोचा कि शायद उसने जल्दबाजी कर दी।
लेकिन हर बार आशीष की कही एक बात उसके कानों में गूंज जाती—
“इंसान की सबसे बड़ी दौलत उसका मन का सुकून होता है।”
उसने नौकरी ढूंढ़नी शुरू कर दी।
कई जगह आवेदन भेजे।
कुछ जगह इंटरव्यू दिए।
कहीं अनुभव की कमी आड़े आई।
कहीं उम्र।
कहीं पढ़ाई।
लेकिन उसने हार नहीं मानी।
अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं था।
लगभग एक महीने बाद उसे एक छोटे से कार्यालय में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिल गई।
वेतन बहुत ज्यादा नहीं था।
लेकिन इतना जरूर था कि वह सम्मानपूर्वक जीवन शुरू कर सके।
पहले दिन जब वह नौकरी पर गई तो उसे लगा जैसे वह किसी नई दुनिया में कदम रख रही है।
एक ऐसी दुनिया जहाँ लोग उसे उसके नाम से जानते थे, उसके चेहरे से नहीं।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
जिंदगी फिर से पटरी पर लौटने लगी।
हालांकि संघर्ष कम नहीं हुए थे।
कई बार उसे अपने पुराने जीवन की चमक-दमक याद आती।
कई बार आसान पैसे का आकर्षण भी उसे कमजोर बनाता।
लेकिन अब उसके भीतर कुछ बदल चुका था।
वह वापस नहीं लौटना चाहती थी।
करीब दो महीने बाद एक शाम वह फिर उसी बस स्टॉप पर खड़ी थी।
वही जगह।
वही सड़क।
वही भीड़।
और वही इंतजार।
लेकिन इस बार उसका इंतजार किसी ग्राहक के लिए नहीं था।
किसी सौदे के लिए नहीं था।
बस यूं ही…शायद किसी पुराने परिचित की याद में।
तभी उसकी नजर सामने पड़ी।
एक परिचित चेहरा सड़क पार करके उसकी ओर आ रहा था।
रजनी का दिल तेजी से धड़कने लगा।
वह आशीष था।
आशीष ने उसे देखते ही मुस्कुरा कर कहा—
“अरे! आप?”
रजनी भी मुस्कुरा दी।
“जी…मैं।”
“कैसी हैं आप?”
“अच्छी हूँ।”
और यह कहते समय उसे महसूस हुआ कि शायद वह सचमुच अच्छी है।
बहुत दिनों बाद।
दोनों बस स्टॉप की बेंच पर बैठ गए।
कुछ देर तक सामान्य बातें होती रहीं।
फिर अचानक आशीष बोला—
“उस दिन के बाद आप दिखाई नहीं दीं।”
रजनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“जिंदगी बदलने में थोड़ी व्यस्त थी।”
“अच्छा?”
“हाँ।”
“और बदली?”
रजनी ने कुछ क्षण आसमान की तरफ देखा।
फिर धीरे से बोली—
“शायद पहली बार सही दिशा में।”
आशीष उसकी बात पूरी तरह समझ नहीं पाया।
लेकिन उसने और कुछ पूछना उचित नहीं समझा।
कुछ लोग अपनी कहानी तभी बताते हैं जब उनका मन तैयार होता है।
और कुछ कहानियाँ बिना बताए भी समझी जा सकती हैं।
बस आने की घोषणा हुई।
दोनों उठ खड़े हुए।
बस स्टॉप पर हलचल बढ़ गई।
रजनी ने आशीष की तरफ देखा।
आज उसके चेहरे पर वह आत्मविश्वास था जो पहले कभी नहीं था।
क्योंकि अब उसे किसी की स्वीकृति की जरूरत नहीं थी।
वह स्वयं को स्वीकार कर चुकी थी।
बस चलने लगी।
खिड़की से बाहर देखते हुए रजनी मुस्कुराई।
उसे लगा जैसे वर्षों बाद उसने अपने भीतर खोई हुई वह स्त्री खोज ली है, जो सम्मान, आत्मविश्वास और उम्मीद के साथ जीना चाहती थी।
वह जानती थी कि अतीत मिटाया नहीं जा सकता।
लेकिन भविष्य लिखा जा सकता है।
और अब वह अपना भविष्य स्वयं लिखने जा रही थी।
उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी।
और दिल में एक नया विश्वास।
क्योंकि उस दिन उसने किसी आदमी को नहीं पाया था…
उस दिन उसने स्वयं को पा लिया था।
समाप्त
