आदरणीय पाठकगण, नमस्कार
हिंदी क्राइम फिक्शन की अद्भुत दुनिया में आप सभी का स्वागत है। वो दुनिया जिसे बस हम लेखकों और पाठकों ने मिलकर बनाया है, जिसमें किसी तीसरे के लिए कोई स्थान नहीं है। लेखन और पठन का अनवरत सिलसिला सदियों से चलता आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा। लेखक बदल जायेंगे, पाठक बदल जायेंगे, लेखन और पठन का स्वरूप भी बदल जायेगा, मगर ऐसा कभी नहीं होगा कि लेखक-पाठक डायनासोर बनकर रह जायें। होता बस इतना है कि वर्तमान भूत में परिवर्तित हो जाता है और भविष्य वर्तमान में, संसार यूं ही चलता रहा है।
एक से लेकर सौ तक मेरा लिखा पढ़ने के लिए आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद।
इस अनवरत साथ और स्नेह के लिए धन्यवाद।
मेरा पाठक बनने के लिए धन्यवाद।
हिंदी पढ़ने के लिए धन्यवाद।
मैं कई सालों से इस वक्त का इंतजार कर रहा था, ताकि आपको बता सकूं कि लेखन का यह सफर मेरे लिए कितना सुगम और कितना दुर्गम रहा। पहले भी बता सकता था मगर नहीं बताया क्योंकि ‘क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसका क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत सरल हो’। आज मेरे पास विष भी है और दांत भी, इसलिए उन सभी लोगों को क्षमा कर सकता हूं, जिन्होंने कदम कदम पर पर मेरे लेखन में रोड़े अटकाये, मुझे हतोत्साहित किया, इस बात की पूरी पूरी कोशिश की कि मैं लिखना बंद कर दूं, जबकि मेरे साथ उनकी कोई व्यक्तिगत अदावत नहीं थी। उनमें से कुछ अब जाने पहचाने चेहरे बन चुके हैं जबकि बाकियों से मैं अभी भी नावाकिफ हूं।
चलिए सबसे पहले आपको एक पुराना किस्सा सुनाता हूं। बात साल 1993 की है जब मैं दसवीं क्लास में था। उपन्यास पढ़ने की लत लगी हुई थी, मगर तब ऐसा नहीं था कि केवल एक खास लेखक को ही पढ़ना है। रेहड़ी से किराये पर पचास पैसे में जो भी हासिल हो जाता था लेकर पढ़ लिया करता था, और कभी कभी परिजनों की निगाहों में आने के बाद कुट भी जाता था, मगर परवाह नहीं थी।
उन्हीं दिनों अमित खान साहब का एक उपन्यास हाथ लगा, नाम संभवतः ‘मौत की कुर्सी’ था। उसके बैक कवर पर लिखा था तेरह साल की उम्र में लिखने वाला पहला लेखक। बस देखकर दिमाग हिल गया। पहला ख्याल मन में यही आया कि जब अमित खान तेरह साल में लिख सकते हैं तो मैं पंद्रह साल की उम्र में क्यों नहीं लिख सकता। फिर क्या था, स्कूल की पुरानी कॉपियों के पन्ने फाड़कर एक नई और मोटी कॉपी तैयार की और सुई धागे से उसे सिल भी दिया। उसके बाद मैंने अपना पहला उपन्यास लिखना शुरू किया जिसका नाम था ‘मां के आंचल में’ कहानी जम्मू कश्मीर से शुरू की क्योंकि कुछ दिनों पहले ही मां वैष्णो देवी के दर्शन कर के आया था। आपको सुनकर हैरानी होगी, अतिश्योक्ति भी महसूस हो सकती है, मगर ये सच है कि अपना वह उपन्यास मैंने बस आठ-दस दिनों में पूरा कर लिया था। कितने पेज थे, या उसमें क्या लिखा था अब मुझे कुछ याद नहीं है, ना ही वह कॉपी मेरे पास है। मगर हिम्मत देखिये कि उस उपन्यास पर जिल्द चढ़ाकर मैं सीधा डायमंड के ऑफिस पहुंच गया, और संपादक महोदय से मिलकर कहा कि ‘मैंने एक उपन्यास लिखा है, कितना पैसा देंगे’ सुनकर उन्होंने मुझे चाहे जिस निगाहों से देखा हो, मगर मैंने तो उस वक्त यही महसूस किया कि वह इस बात पर हैरान थे कि उतनी छोटी उम्र में मैंने उपन्यास लिख दिया था।
मैं उन सज्जन व्यक्ति के धैर्य और विनम्रता को नमन करता हूं कि उन्होंने मुझे अपने ऑफिस से भगा नहीं दिया, बल्कि ये कहकर इज्जत के साथ वापिस भेजा कि ‘अभी हमने उपन्यासों का प्रकाशन बंद कर रखा है, जब फिर शुरू करेंगे तो आपको खबर कर देंगे’। मन ही मन खुशी से उछलते हुए मैंने उन्हें अपना एड्रेस एक कागज पर नोट कर के दिया और वहां से बाहर निकल गया, एड्रेस इसलिए क्योंकि वह मोबाईल का जमाना नहीं था।
खैर आगे मैंने कई प्रकाशनों को पोस्टकार्ड भेजा और सबमें यही सवाल किया कि ‘मैंने एक उपन्यास लिखा है, कितना पैसा देंगे’ हंस लीजिए आप लेकिन ये सच है। जानकारी का अभाव था, बल्कि उस सिलसिले में एबीसीडी तक नहीं पता थी इसलिए मैं वह हिम्मत दिखा बैठा था। जो आगे बीस पच्चीस सालों तक नहीं दिखा पाया।
मगर असल बात का पता लगते मुझे ज्यादा वक्त नहीं लगा। हैरानी की बात थी कि जिन प्रकाशनों को मैंने पोस्टकार्ड भेजा था, उन्होंने रिप्लाई भी किया था, और तकरीबन सभी के लिखे का एक ही मतलब था कि ‘अभी हमने उपन्यासों का प्रकाशन बंद कर रखा है’। जब हर जगह से वैसे ही जवाब आये तो धीरे धीरे ये समझ में आ गया कि बात प्रकाशन बंद होने की नहीं है, बात ये है कि कोई मुझे प्रकाशित नहीं करना चाहता। अलबत्ता ये बात तो फिर भी नहीं समझ पाया कि क्यों नहीं करना चाहता। क्योंकि अपनी निगाहों में तो मैंने एक उपन्यास लिखकर दुनिया फतह कर ली थी।
मगर मैं रुका नहीं, अमित जी से कॉम्पिटिशन के चक्कर में मैं लगातार कागज काले करता चला गया। और हैरानी की बात देखिये कि पहली बार छपा भी तो कहां से, टॉप के न्यूज पेपर नवभारत टाईम्स से। बहुत छोटा सा लेख था वह जो मैंने नीम के पेटेंट पर लिखा था, वह छपा तो जैसे मुझे पर लग गये, उसके बाद मैंने पचासों रचनायें नवभारत टाईम्स को भेजीं, मगर एक भी नहीं छपी। फिर चंदामामा, चंपक, नंदन और भी जाने क्या-क्या ट्राई करता रहा। कभी कहीं कहानी छप जाती तो मारे खुशी के उछल पड़ता वरना तो प्रकाशनों के जवाब में इंतजार भर करता रहता था, और आखिरकार वे लोग मेरी रचनायें मुझे वापिस लौटा दिया करते थे।
उन दिनों ये बहुत अच्छी बात हुआ करती थी कि आप अगर वापसी का डाक टिकट लगा लिफाफा अपनी रचना के साथ भेज देते थे, तो प्रकाशित न करने की सूरत में वह आपको वापिस लौटा दी जाती थी। जिससे लेखक उसी रचना को किसी दूसरे प्रकाशक को भेज दिया करता था। इंटरनेट का नाम तक नहीं सुना था, ईमेल की तो बात ही अलग थी। और जहां तक मुझे याद पड़ता है फोटो स्टेट मशीन भी प्रचलन में नहीं थी, कम से कम गलियों मोहल्लों में तो नहीं ही दिखाई देती थी।
वक्त यूं ही गुजरता गया, और पहली जिक्र के काबिल उपलब्धि हासिल हुई हिंदी साहित्य अकादमी से, जहां मेरी एक कहानी को सैकड़ों लोगों के बीच सम्मानित किया गया। वहीं पहली बार हिंदी साहित्य के कुछ बेहद नामी गिरामी लेखकों से मुलाकात हुई, जिनमें ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव जी, चित्रा मुद्गल जी के नाम मुझे आज भी याद हैं। वहां किसी लेखक की हालिया प्रकाशित कहानी को लेकर बहुत बहस हुई थी, जिसमें उन्होंने नंगी गालियों का इस्तेमाल किया था, और उस बाबत उन्होंने लेखक राही मासूम रजा के उपन्यास ‘आधा गांव’ का उदाहरण देते हुए कहा था कि वह अपनी भाषा को पात्रों की भाषा से अलग नहीं रख सकते। वह बात आज भी ज्यों की त्यों लागू होती है, हर जॉनर में लागू होती है, लेखक पात्रों की भाषा को बदलेगा तो उनके किरदार के साथ न्याय नहीं ही कर पायेगा।
बहरहाल अब बात करते हैं एक से सौ के बीच के वक्फे की। मैं लिखता गया आप पढ़ते गये। मैं और लिखता गया आप और पढ़ते गये। जिससे हौसला बढ़ा और कभी 5-6 महीनों में उपन्यास लिखने वाला लेखक हर महीने आपके सामने एक उपन्यास परोसने लगा। मगर बात वहीं तक सीमित नहीं रही क्योंकि आपके अंदर पढ़ने की भूख थी और मेरे अंदर लिखने की, लिहाजा रफ्तार बढ़ती गयी जिसका परिणाम सुखद रहा और वर्ष 2025 में मैंने 21 उपन्यास लिख दिये।
परन्तु ऐसा नहीं है कि मैंने लिखना चाहा और लिख दिया, नहीं लेखन कोई ऐसा काम नहीं है जो महज चाहने भर से पूरा कर पाना संभव हो। वो कहावत है न कि खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान, मेरे साथ भी कुछ कुछ वैसा ही है। मां सरस्वती इस अकिंचन पर हमेशा अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखती हैं, इसलिए मैं लेखन के मामले में पहलवान हो गया। साल में कभी 16, कभी 18, तो कभी 21 उपन्यास मैंने आपके लिए लिख मारे।
यह ईश्वरी कृपा ही है जिसने उस दुरूह काम को मेरे हाथों पूरा करवाया। लगातार करवाता रहा, और उम्मीद करता हूं आगे भी यह सिलसिला जारी रहेगा। आप शायद यकीन न करें, मगर ये सच है कि कभी कभी मुझे ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी रात मैं पंद्रह पेज लिखकर सोया और अगली सुबह उठकर देखा तो उपन्यास के पचास पृष्ट पूरे हो चुके थे। जानता हूं ये संभव नहीं है, मगर इस बात को मैंने अपने लेखकीय जीवन में कई बार महसूस किया है।
खैर साल 2017 में मेरा पहला उपन्यास प्रकाशित हुआ ‘अनदेखा खतरा’ जिसे मैं कई साल पहले, शायद अठारह उन्नीस साल पहले से लिखे बैठा था। उसके बाद ‘आखिरी शिकार’ फिर ‘खतरनाक साजिश’ और चौथा उपन्यास ‘मौत की दस्तक’ था। ये चारों ही लंबे अंतराल के बाद प्रकाशित हुए थे। और तब हुए जब मैं उपन्यास प्रकाशन का मोह पूरी तरह त्याग चुका था, अलबत्ता लेखन से जुड़ाव अनवरत बना हुआ था। कई सालों से दिल्ली के दरियागंज इलाके में स्थित रंगभूमि प्रकाशन में बतौर एडिटर नौकरी करता था, जहां से दर्जन भर सत्यकथाओं की पत्रिकायें निकला करती थीं, और हर महीने मैं अपनी दो तीन कहानियां तो उसमें लगा ही देता था। मतलब छपास की भूख पहले की अपेक्षा 2017 आते आते काफी हद तक शांत हो चुकी थी।
‘अनदेखा खतरा’ के प्रकाशन के बाद का एक किस्सा बताता हूं आपको। किताब अमेजन और फ्लिपकार्ट पर लाईव हो चुकी थी। ऑथर कॉपी मुझे हासिल हो चुकी थी और मैं मारे खुशी के फूले नहीं समा रहा था। बल्कि जिन लोगों को मिलकर दिखाना संभव हुआ उन्हें दिखाया भी कि मेरा उपन्यास छपा है। बावजूद इसके कि यूं उछलने की मेरी उम्र नहीं थी, 39 साल का हो चुका था, खुद को बहुत समझदार और परिपक्व समझता था। मगर क्या करता वह खुशी ऐसी थी जिसे मैं खुद तक सीमित नहीं रख पा रहा था।
उपन्यास प्रकाशित होते के साथ ही मैं अपनी गिद्ध दृष्टि उक्त प्रकाशन की सेल्स रिपोर्ट पर गड़ाकर बैठ गया। एक एक कर के दिन गुजरते चले गये। पंद्रह दिनों में बस एक किताब बिकी, वह भी खुद मैंने खरीदी थी। डेढ़ महीने बाद एक और बिक गयी जो मैंने किसी दोस्त के लिए ऑनलाईन परचेज किया था। मैं हैरान रह गया, प्रकाशक पर शक भी हुआ कि कहीं सेल्स रिपोर्ट झूठी तो नहीं थी। मगर उसमें मैं कुछ भी नहीं कर सकता था। आखिरकार मैंने अपने एक-एक जानकार को बताना शुरू किया कि मेरा पहला उपन्यास प्रकाशित हो चुका था। उसमें दोस्त और रिश्तेदार सब शामिल थे। बताने के पीछे दोहरी वजह थी, पहली ये कि मुझे लगता था मैंने जग जीत लिया है इसलिए दुनिया की वाहवाही का पात्र बन गया हूं, दूसरी ये कि मेरे जानने वालों को जब ये पता लगेगा कि मेरी किताब छपी है तो फौरन खरीद लेंगे। जहां तक मुझे याद पड़ता है करीब 40-50 कॉल्स तो कर ही दी थीं। ऐसे लोगों को भी कर दीं, जिनसे बस होली दिवाली ही बात हुआ करती थी। सब ने वादा किया कि बस फोन कटते ही ऑर्डर लगा देंगे। बल्कि अपने पहचान वालों को भी कहेंगे कि खरीदें। मतलब कम से कम भी पांच सौ किताबें तो अब बिक ही जानी थीं।
सेल्स रिपोर्ट देखने का सिलसिला ज्यों का त्यों जारी रहा, बल्कि अब दिन में कई कई बार देखने लगा, जिसमें कोई बढ़ोत्तरी तो नहीं ही नजर आ रही थी। फिर एक दिन मेरे एक रिश्तेदार का फोन आया जिनके साथ मेरे दोस्ताना संबंध हैं, उन्होंने बताया कि फ्लिपकार्ट पर मेरी किताब ऑर्डर कर दी है। मैं बहुत खुश हुआ, उन्हें धन्यवाद दिया, आखिर वह बात तपते रेगिस्तान में पानी मिलने जैसी महत्वपूर्ण घटना जो थी।
खैर अब तो सेल्स रिपोर्ट में दो से तीन किताबों की बिक्री आ ही जानी चाहिए थी। मगर नहीं आई, कई दिन बीत गये, फिर मैंने प्रकाशक से उस बारे में सवाल किया, और इस यकीन के साथ किया कि किताबें तो बिक रही थीं, बस वही मुझसे झूठ बोल रहा था। झूठी रिपोर्ट दे रहा था, तब प्रकाशक ने बताया कि फ्लिपकॉर्ट के जिस ऑर्डर की बात मैं कर रहा था, वह करने के बाद कैंसिल कर दिया गया था।
सुनकर मैं भौंचक्का रह गया, तुरंत उस रिश्तेदार को कॉल कर के सवाल किया तो उसने बताया कि हां कैंसिल कर दिया था, क्योंकि बच्चों के एग्जाम चल रहे थे, वैसे में वह उपन्यास पढ़ने में अपना वक्त बर्बाद नहीं कर सकता था। बाद में एग्जॉम हो चुकने के बाद वह फिर से ऑर्डर कर देगा।
ये थी जनाब ‘अनदेखा खतरा’ के प्रकाशन के शुरूआती तीन महीनों की रिपोर्ट। मैं निराश था, समझ में नहीं आ रहा था कि चल क्या रहा है। एक बार भी ये नहीं सोचा कि कोई मेरी किताब क्यों खरीदेगा? या उनकी जगह मैं होता तो क्या एक ऐसे लेखक की किताब परचेज कर लेता, जिसपर एक रीव्यू तक नहीं था, जिसका कभी नाम तक नहीं सुना था? जिसकी किताब की कीमत दूसरे नामी गिरामी लेखकों की तुलना में डबल थी, ऐसे लेखकों की तुलना में जिन्हें भरपूर मनोरंजन की गारंटी समझा जाता था।
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अपराध की जड़ बस तीन बातों को माना गया है जर, जोरू और जमीन। सबकुछ इसके अंदर ही निहित है, ये लेखक की कुशलता पर डिपेंड करता है कि कैसे वह उन्हीं वजहों को लेकर हर बार एक नई कहानी जो पिछली कहानी से एकदम जुदा हो, गढ़कर अपने पाठकों के समक्ष परोस देता है। उससे भी अहम बात ये कि कहानी का प्लॉट बढ़िया होना किसी उपन्यास के बढ़िया होने की गारंटी नहीं बन सकता। क्योंकि प्लॉट अक्सर दो तीन लाईनों में समेटे जा सकते हैं, जबकि लेखक उन तीन लाईनों को तीन सौ पेज में फैलाता है, और उसे इस बात का ध्यान रखना होता है कि कहीं भी उपन्यास की गति बाधित न हो, वह पाठकों को बोझिल न लगने लगे, तब जाकर वह एक उपन्यास आपकी पसंद पर खरा उतरता है। वरना मर्डर मिस्ट्री में अलग क्या होता है, हर किताब में एक कत्ल होता है, कई बार एक से ज्यादा भी हो जाया करते हैं, फिर लेखक दर्जन भर सस्पेक्ट खड़े करता है जिनमें से बस तीन चार मुख्य सस्पेक्ट दिखाई दे रहे होते हैं, और आखिर में उपन्यास के हीरो के माध्यम से वह साबित कर देता है कि कत्ल फलां आदमी ने किया था। यही तो होता है हर उपन्यास में, जिसपर लेखक कड़ी मेहनत न करे तो उसका हर उपन्यास उसके ही दूसरे उपन्यास की हूबहू कॉपी दिखाई देने लगेगा।
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इस मामले में बहुत ही खुशकिस्मत रहा हूं, आज तक मेरी किसी भी किताब को आप पाठकों ने नकारा नहीं है। मतलब एक साथ आप सभी ने ये नहीं बोल दिया कि फलां किताब बेकार थी, पढ़ने लायक ही नहीं थी। कुछ लोगों ने कभी आपत्ति जताई भी तो उसकी वजह उपन्यास के क्लाईमेक्स में वर्णित दृश्य भर रहे थे। जैसे गद्दार में कई पाठकों ने कह दिया कि जो हुआ वह नहीं होना चाहिए था। कुछ ने स्वीकार किया कि वह दृश्य पढ़कर रो पड़े थे। इसी तरह सीक्रेट बिहाइंड कॉफिंस में आखिर में दोनों पुलिस ऑफिसर्स के साथ जो कुछ भी हुआ वह पाठकों को कबूल नहीं था। मैंने सोचा भी था कि उसका नया पार्ट लाकर दोनों ऑफिसर्स को उनके पैरों पर खड़ा कर दूंगा, मगर अभी तक तो पॉसिबल नहीं ही हो पाया है।
इससे इतर भी कुछ शिकायतें भी मिलती हैं, जैसे कहीं राम को श्याम लिख दिया, या फलां शहर में फलां जगह पर वैसा कोई बिजली का खंबा नहीं है जिसका मैंने उपन्यास में जिक्र किया था। मेरे उपन्यासों के अपराधी पुलिस को हमेशा उल्लू क्यों बनाने में कामयाब हो जाते हैं? पनौती इतनी मारपीट करता है तो उसे गिरफ्तार कर के जेल क्यों नहीं भेज दिया जाता? वगैरह वगैरह….
साहबान उपन्यास पढ़िये, कहानी का आनंद लीजिए, क्या फर्क पड़ गया अगर राम को एक जगह श्याम लिख दिया गया, क्योंकि उससे कहानी पर तो कोई फर्क नहीं पड़ रहा। फिर ये भी तो सोचिए कि वह किताब लेखन कार्य शुरू होने के महज पंद्रह से बीस दिनों के भीतर आपके हाथों में है, तो इतने कम समय में प्रकाशित हुई किताब की इन छोटी मोटी प्रूफ की गलतियां नजरअंदाज करना तो बनता है न? रही बात पनौती जेल क्यों नहीं भेज दिया जाता, तो उसका बस एक ही जवाब है, वह उपन्यास का हीरो है उसे जेल तभी भेजा जा सकता है जब वह सीरीज बंद करनी हो, जो आप खुद भी नहीं चाहते होंगे। फिर जहां बड़े बड़े अपराधी खुलेआम क्राइम कर के आजाद घूम रहे हैं, वहां पनौती जैसे ईमानदार और सच्चे इंसान को, जो हमेशा अच्छी नीयत से, परोपकार के उद्देश्य से आगे बढ़ रहा होता है, जेल क्यों भेजा जाना चाहिए?
उपन्यास के पेज ज्यादा थे, उन्हें कम किया जा सकता था। चालीस-पचास पेज हट जाते तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। या उपन्यास हड़बड़ी में खत्म कर दिया गया, दस बीस पेज और लिखे जा सकते थे। जरा सोचकर देखिये जनाब कि क्यों बढ़ाऊंगा मैं किसी उपन्यास के पेज, या किसी स्टोरी को जल्दी क्यों खत्म कर दूंगा? हासिल क्या होना है उससे मुझे? नहीं अपनी तरफ से मैंने कभी ऐसा नहीं किया, आप को वैसा लगा तो वह कोई हैरान करने वाली बात नहीं है, क्योंकि हर इंसान का किसी चीज को देखने का अपना एक अलग नजरिया होता है।
इस मामले में मैं बस इतना कहूंगा कि मैं हर किताब को अपना सौ फीसदी देता हूं, उसके बाद वह किताब आपको कितना पसंद आती है उसपर मेरा कोई जोर नहीं होता क्योंकि मैं उसे लिख चुका होता हूं।
आगे कोई उसे बकवास कहे, अच्छी कहे, बहुत अच्छी कहे, मैं कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि अपने सौ फीसदी से ज्यादा कोई नहीं दे सकता किसी भी काम को।
मैं हर रोज दस से बारह घंटे आपके लिए लिखता है, लगातार लिखता हूँ, तब कहीं जाकर पंद्रह बीस दिनों में एक कहानी तैयार हो पाती है। ना कि मैंने चाहा और उपन्यास पूरा हो गया। वैसा हो जाता तो बात ही क्या थी, फिर मैं हर रोज आपको एक उपन्यास दे रहा होता और आप पढ़ते पढ़ते थक जाते।
किंडल पर 8 सालों में सौ किताबें प्रकाशित करना आसान था, आप हजार दो हजार भी कर सकते हैं। मगर दुनिया का कोई भी प्रकाशक महीने में दो उपन्यास एक ही लेखक के छापने को हरगिज भी तैयार नहीं होता। यूं तो एक किताब की एडिटिंग, प्रूफ रीडिंग भी नहीं शुरू हुई होती और मैं दूसरा उपन्यास उसे ले जाकर थमा देता।
इस असंभव से दिखने वाले कार्य को संभव बनाया इकराम फरीदी साहब ने ‘थ्रिल वर्ल्ड’ की स्थापना कर के, और ऐन उसी वजह से आज आपके हाथों में मेरा सौंवा उपन्यास मौजूद है। वरना तो 25-30 भी मुश्किल से छप पाये होते, भले ही मैंने कितने भी क्यों न लिख मारे होते। बल्कि लिखे ही नहीं होते, क्योंकि ना छपने से ज्यादा हतोत्साहित करने वाली बात एक लेखक के लिए दूसरी कोई हो ही नहीं सकती।
आज के दौर में जब मनोरंजन के साधन जेब में समा जाया करते हैं। वेब सीरीज, मूवीज, गेम, और भी जाने क्या-क्या, और बचा खुचा समय सोशल मीडिया खा जाता है तो ऐसे में अपने लिए एक नया पाठक तैयार करना चील के घोंसले से मांस हासिल करने जैसा दुरूह काम बनकर रह गया है, ऐसे में अगर कंटेंट में दम नहीं होगा तो कोई किसी का एक उपन्यास भले ही पढ़ ले, दूसरे को हाथ नहीं लगाने वाला।