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मैंने लेखन को विराम दे दिया है।

करीब डेढ़ महीने पहले मैंने आखिरी उपन्यास डेडली ट्रैप लिखा था।

क्यों?

मैंने कभी लेखन को सिर्फ कमाई का जरिया नहीं माना। अगर उद्देश्य केवल पैसा कमाना होता, तो शायद मैं भी छह-छह महीने या साल भर में एक उपन्यास लिखता और वह उपन्यास किसी बहुत बड़े प्रकाशन से आ रहा होता, मगर मैंने उसको तरजीह नहीं दी क्योंकि लिखने के मामले में मैं बहुत बेसब्रा था और उसी हिसाब से प्रकाशन के मामले में भी, किताब लिख चुकने के बाद मेरे लिए प्रकाशकीय इंतजार असंभव था, जो अधिकांश प्रकाशनों में तीन महीने से लेकर एक साल, और कभी-कभी दो साल तक का भी हो जाता है। इसलिए मैंने सहज रास्ता अपनाया, ताकि मुझे प्रकाशन के लिए इंतजार न करना पड़े और आपको पढ़ने के लिए न करना पड़े। मैंने हमेशा कोशिश की कि मेरे पाठकों को नई कहानी के लिए ज्यादा इंतजार न करना पड़े। यही वजह है कि दिन-रात मेहनत करके, तमाम जरूरी चीजों को नजरअंदाज कर के, बीस दिन में एक या कभी-कभी एक महीने में दो-दो उपन्यास भी लिख डाले। यह सब केवल इसलिए था कि आपको लगातार नई कहानियाँ मिलती रहें।

और हासिल?

एक कलाकार के लिए उसके चाहने वालों का प्यार, सहयोग, प्रोत्साहन और विश्वास सबसे पहले है, उसके बाद कहीं जाकर पैसे की बारी आती है। कम से कम मेरे मामले में तो ऐसा ही है। वरना चोरी की सामग्री पढ़ने वाले हजारों लोगों और उससे होने वाले आर्थिक नुकसान को भूलकर मैं नियमित लेखन नहीं कर रहा होता। मगर मैंने किया, मैंने अपना हौसला कभी टूटने नहीं दिया।

लेकिन पिछले कुछ समय से मन बहुत व्यथित है।

मेरे उपन्यास हजारों लोग पढ़ते हैं, नये उपन्यास का इंतजार भी करते हैं, लेकिन जब सार्वजनिक प्रतिक्रिया की बात आती है, तो ज़्यादातर पाठक मौन धारण कर लेते हैं। ऐसे में कुछ गिने-चुने लोग, जो लगभग हर पुस्तक पर नकारात्मक प्रतिक्रिया दर्ज करते हैं और कई बार लेखक पर व्यक्तिगत टिप्पणियाँ भी करते हैं, वही सबसे अधिक दिखाई देने लगते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि वे दो-चार आवाजें मेरे हजारों पाठकों पर भारी पड़ जाती हैं। सच यह है कि हज़ारों पाठकों में से पाँच सौ भी अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कर देते, तो वे आवाज़ें यूँ दब जातीं कि किसी को सुनाई ही नहीं देतीं।

विडंबना यह है कि जिन्हें पुस्तक पसंद आती है, वे अक्सर कुछ लिखते ही नहीं। सच तो यह भी है कि बहुत से लोग यह स्वीकार तक नहीं करते कि वे मुझे पढ़ते हैं, जबकि अगर ऐसा होता तो मेरे उपन्यासों के पाठक आज हजारों की संख्या में कभी नहीं पहुँचते। और प्रकाशन के पहले ही सप्ताह में मेरे अधिकांश उपन्यासों की पाँच से छह हज़ार प्रतियाँ नहीं पढ़ ली जातीं। मगर अफसोस कि आप पढ़ते हैं, नए उपन्यास का इंतज़ार भी करते हैं, लेकिन उसके बारे में दो शब्द लिखने की परंपरा अब भी हमारे बीच नहीं बन पाई।

शायद यही कारण है कि पहली बार लिखने का उत्साह डगमगाया है। बीते 18 जून को मैंने लेखन से विराम लिया था, जो लगातार जारी है। और पिछले नौ सालों में पहली बार मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि मैं लिखे बिना रह सकता हूं। और इसके साथ ही भरपूर समय भी मिल गया है, इतना समय, जो पिछले नौ वर्षों में मुझे कभी नसीब नहीं हुआ। आगे पहले की तरह लिख भी पाऊँगा या नहीं, इसका उत्तर इस समय मेरे पास भी नहीं है। या यूं कह लीजिए कि भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है।

याद रखिये मित्रों, लेखक केवल शब्दों से नहीं लिखता, वह अपने पाठकों की प्रतिक्रिया से भी लिखता है। जब वह प्रतिक्रिया बहुत कम रह जाए, तो मन बार-बार यही सोचने लगता है कि क्या लिखने का, या पहले जैसी गति से लिखते रहने का कोई अर्थ रह गया है। किसके लिए लिख रहा हूँ मैं? क्यों लिख रहा हूँ मैं? और आख़िर किस हासिल की खातिर लिख रहा हूँ मैं?

बहरहाल ये चिंतन मनन का वक्त है, जो चल रहा है।

मैं लेखकीय जीवन के दोराहे पर खड़ा हूं, जहां से एक रास्ता अनवरत लेखन की तरफ जाता है, जबकि दूसरा रास्ता ‘संतोष पाठक ने अपने जीवन में 109 उपन्यास लिखे’ की तरफ। बहरहाल देखते हैं आगे क्या होता है, लेकिन एक कसक शायद जीवन भर रहेगी कि जिन हज़ारों पाठकों के लिए मैंने दिन-रात एक करके लिखा, उनमें से बहुत कम लोग अपनी सार्वजनिक प्रतिक्रिया दर्ज कर पाए। शायद एक लेखक के लिए यही सबसे बड़ी कसक बनकर रह जाती है।

उम्मीद है, मेरे इस मौन को भी मेरे पाठक उसी संवेदना के साथ समझेंगे, जिस संवेदना के साथ उन्होंने मेरी कहानियाँ पढ़ी हैं।

 

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