Skip to content
Menu

मैं गुवाहाटी से डिब्रूगढ़ टाउन जाने के लिए ट्रेन में सवार हुआ। टू टियर की इकत्तीस नंबर की लोअर सीट, जिसका मेरे पास रिजर्वेशन था, मुझे आकूपाईड मिली। उस सीट पर एक महिला पहले से ही लेटी हुई थी। मैंने उसे बताया कि वह मेरी सीट थी। इससे पहले कि वह जवाब में कुछ कहती, सामने की लोवर सीट पर पसरा एक शख्स बोल पड़ा- भाई साहब इनके घुटनों में दर्द है, ऊपर वाली बत्तीस नंबर की सीट इनकी है, उस तक पहुँचने में इन्हें दिक्कत होगी, आप उस पर चले जाइए। मैंने कोई ना-नुकर नहीं की, चुपचाप ऊपर की सीट पर चढ़कर सो गया। बाद में पता चला कि महिला की हिमायत करने वाला शख्स उसका पति था, जो खुद लोअर सीट पर लेटा हुआ था मगर पत्नी को वह सीट देने और खुद ऊपर जाकर लेटने को राजी नहीं था।

महाराष्ट्र के अकोला स्टेशन की बात है। मेरी ट्रेन का समय रात्रि बारह बजे का था। नींद से आँखें बोझिल हुई जा रही थीं। मैं वेटिंग रूम में जूते उतार कर एक बेंच पर फैलकर सो गया। थोड़ी देर बाद आँख खुली तो जूते नदारद थे। जिन्हें अभी हफ्ता भर पहले ही मैंने खरीदा था। रात के वक्त कोई दुकान भी नहीं खुली मिलने वाली थी और इत्तेफाक से मेरे पास कोई चप्पल भी नहीं थी। ट्रेन आयी तो मैं नंगे पांव उसमें सवार हो गया। अगली सुबह मैंने अपने पास बैठे एक दम्पत्ति को बातों ही बातों में अपनी आपबीती सुना डाली। तब महिला ने अपने बैग से निकालकर एक नयी-नकोर चप्पल मेरे हवाले कर दी। मैंने बहुत मना किया मगर वह नहीं मानी। आखिरकार मैंने वह चप्पल ले ली। पैसे देने की कोशिश की तो वह लेने को तैयार नहीं हुई। तभी ऊपर की बर्थ पर लेटा उनका लड़का, जो काफी देर से हमारी बातें सुन रहा था, नीचे उतर आया और मुझसे बोला- “अच्छे भले दिखाई देते हो, यूँ सीधे-सादे लोगों को बेवकूफ बनाते शर्म नहीं आती।” कहकर उसने चप्पल अपने पांव में पहन ली और बाथरूम की ओर बढ़ गया। मैं हकबकाया सा उसकी शक्ल देखता रह गया।

उस रोज मैं रांची से दिल्ली जाने के लिए राजधानी एक्सप्रेस में सवार हुआ था। रात बढ़िया कटी थी। अगली सुबह आँख खुली तो देखा मेरे सामने वाली सीट पर लेटी महिला उसी अवस्था में केले खाये जा रही थी और छिलकों को हाथ पीछे ले जाकर राहदरी में फेंक दे रही थी। आखिरकार मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने उससे कहा कि छिलकों को सीट के नीचे रख दें वरना कोई फिसल जायेगा। उसने ये कहकर चुप्पी साध ली कि वह उसका काम नहीं था। मैंने भी उस बात पर उससे बहस करने की कोशिश नहीं की। थोड़ी देर बाद वह शायद टॉयलेट जाने के लिए उठी। राहदरी में उसका एक पांव वहाँ पड़े छिलके पर पड़ा, वह फिसली और इतनी तेजी से नीचे गिरी कि मुझे लगा उसकी कोई ना कोई हड्डी जरूर खिसक गयी होगी। बहरहाल वह जैसे तैसे उठी, फिर अग्नेय निगाहों से मुझे घूरती हुई बोली- चैन मिल गया तुम्हें?” 

सर्दियों के दिन थे। इंडिगो की अर्ली मॉर्निंग फ्लाइट से मुझे गुवाहाटी जाना था। एयरपोर्ट पर पहुँचा तो पता चला, फ्लाइट री-शेड्यूल हो चुकी थी। अब उसने दो घंटे की देरी से साढ़े नौ बजे उड़ान भरना था। तभी मुझे उससे पहले वाली फ्लाइट की अनाउंसमेंट सुनाई दी। उधर निगाह गयी तो एक नवयुवक को वहाँ खड़े इंडिगो के कर्मचारी के साथ बहस करता पाया। उत्सुकता वश मैं उनके करीब चला गया। पता चला वह भी उसी फ्लाइट का मुसाफिर था, जो दो घंटे लेट हो चुकी थी। वह कर्मचारी से जिद कर रहा था कि वह किसी भी तरह उसे उस फ्लाइट में सवार करा दे, जिसकी उस वक्त अनाउंसमेंट हो रही थी। कर्मचारी ने बड़े ही विनीत लहजे में उसे समझाने की कोशिश की कि वैसा कर पाना संभव नहीं था। मगर मुसाफिर ने जैसे उसकी बात सुनी ही नहीं, वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। तब कर्मचारी ने यह कहकर बात खत्म करने की कोशिश की कि उस फ्लाइट की सभी सीटें आकूपाईड थीं। जवाब में युवक झट से बोला कि वह बाथरूम के पास खड़ा होकर सफर कर लेगा। मैं समझ नहीं पाया कि वह महज मजाक कर रहा था या उसे सचमुच नहीं पता था कि यूँ किसी को फ्लाइट में खड़े होकर यात्रा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती थी।

एक महाशय स्पाइसजेट की फ्लाइट में मेरी बगल वाली सीट पर बैठे हुए थे। खान-पान सेवा शुरू हुई तो उन्होंने एक नॉनवेज सैंडविच और कोक की कैन ली और नाश्ता करने में जुट गये। थोड़ी देर बाद उनसे यूँ ही बातचीत शुरू हुई तो पता चला कि वे महाशय लहसुन-प्याज तक नहीं खाते क्योंकि उनके पूरे परिवार ने देवघर से दीक्षा ली हुई थी। अलबत्ता मैंने उन्हें ये बताने की हरगिज भी कोशिश नहीं की कि जो सैंडविच उन्होंने खाया है, वह निरामिष नहीं था।

नॉर्थ-ईस्ट के ढाबे:

मैं गुवाहाटी से बस में सवार होकर मनकचर जा रहा था। जहाँ कि मुझे अपने एक दोस्त से मिलना था, जो आईबी में तैनात था। रास्ते में बस एक रेस्टोरेंट के सामने जाकर खड़ी हो गयी। वहाँ दो अलग-अलग कतारें थीं, जिनमें से एक वेजिटेरियंस के लिए तो दूसरी नॉन वेजिटेरियंस के लिए थी। मैं क्योंकि वेजिटेरियन हूँ इसलिए सिर्फ लिखा होने से मेरी तसल्ली नहीं हुई। काउंटर पर बैठे शख्स से मैंने ये दरयाफ्त कर लिया कि दोनों तरह के खाने वहाँ अलग-अलग किचन में बनते थे। मैं वेजिटेरियंस वाली कतार में जा बैठा। तत्काल एक खाने की थाली मेरे सामने परोस दी गयी। साथ में तीन तरह की चटनी रखी गयी। मैंने जाने किसी भावना से वशीभूत होकर वेटर को बुलाकर पूछ लिया कि ये चटनी किस चीज की हैं? जवाब मिला एक धनिया मिर्च की, दूसरी अदरक लहसुन की और तीसरी मछली की। मेरा मन वितृष्णा से भर उठा। मैं गुस्से से भरा उठकर काउंटर पर पहुँचा और वहाँ ये जानकारी दी कि कैसे उनके वेज सेक्सन में भी नॉनवेज परोसा जा रहा था। जो जवाब हासिल हुआ वह मेरे लिये सर्वथा अनापेक्षित था- “सर! यह छोटा वाला मछली का चटनी है, उसे पूरा सुखाकर बनाया जाता है, उसमें खून नहीं होता, माँस भी नहीं होता। इसलिए वह वेज होता है, सब खाते हैं।” मैंने बहस करने की बजाय चुपचाप उसे खाने के एक सौ साठ रूपये चुकता किये और जाकर बस में बैठ गया।

ऐसा ही एक दूसरा हादसा मेरे साथ दरंग में पेश आया, जहाँ एक फास्ट फूड रेस्टोरेंट के आगे ‘वेज फूड अवेलेबल’ का बोर्ड देखकर मैं भीतर जा घुसा। वेटर के आने पर मैंने न्यूडल्स का आर्डर दिया तो वह पूछने लगा अंडा डालना है या नहीं।

मैं पटना से मुजफ्फरपुर जा रहा था। रास्ते में कुछ लड़के बोतलों में छाछ बेचते नजर आये, जो कि मेरा पसंदीदा पेय है। मैंने एक बोतल खरीद ली, खरीदने से पहले उससे पूछ भी लिया कि वह क्या है? अलबत्ता उसका जवाब मेरी समझ में नहीं आया। बस चल पड़ी। मैं घूँट-घूँट करके छाछ पीने लगा। स्वाद कुछ अलग था, थोड़ी स्मेल भी आ रही थी, मगर यह सोचकर पीता रहा कि कई दिनों की रखी हुई होगी। जल्दी ही मैं एक तिहाई बोतल डकार गया। इसके बाद मेरा जो हाल हुआ संभाला न गया। आखिरकार मैं रास्ते में ही बस से उतर गया और एक दुकान के सामने रखे बेंच पर जाकर लेट गया। मेरा सिर बुरी तरह घूम रहा था। खड़ा होने पर चक्कर आने लगता था। जब और कुछ नहीं सूझा तो मैंने बोतल में बची छाछ के कुछ घूँट और भर लिये। हालत बद से बदतर होती चली गयी। आखिरकार कुछ स्थानीय लोगों ने मुझे संभाला और डॉक्टर के पास लेकर गये। उसने कोई दवाई दी, इंजेक्शन दिया, फिर मैं वहीं सो गया। तकरीबन दो घंटे बाद मुझे थोड़ा सुकून महसूस हुआ। बाद में पता चला कि छाछ के चक्कर में मैं ताड़ी डकार गया था।

नार्थ-ईस्ट की कुछ विशेषतायें:

अरूणाचल प्रदेश और नागालैंड में अगर आप ड्राइविंग कर रहे हैं और गलती से आपने किसी लोकल वाशिंदे की गाड़ी में खरोंच भी मार दी तो वह अपनी गाड़ी से नीचे उतरकर एक कागज पर अपना पता और फोन नंबर लिखेगा, साथ ही अपनी गाड़ी की चाबी आपके हाथ में पकड़ा देगा और बोलेगा- नयी खरीदकर मेरे घर पहुँचा देना।” और जनाब ये एक कटु सत्य है कि आप चाहे कितनी भी बड़ी तोप क्यों ना हों ऐसा किये बिना खलासी नहीं पा सकते।

अरूणाचल के लोगों की एक और खास आदत का जिक्र करना चाहूँगा। खाना खाते वक्त अगर उनके मुँह में कोई कंकड़, बाल या ऐसा ही कुछ और आ जाये जिसे गटकना उन्हें मंजूर न हो तो उसे मुँह से निकालकर बाहर नहीं फेंकते बल्कि उसी थाली में रख लेते हैं, कई बार सीधा मुँह से ही थूक देते हैं, जिसमें खाना खा रहे होते हैं। ऐसा कर चुकने के बाद वह फिर से उसी थाली से निवाले खाने लगते हैं। वहाँ दूसरी खास बात ये है कि आपको ढूंढे से भी कुत्ते और बंदर के दर्शन नहीं होंगे क्योंकि ये दोनों प्रजातियाँ जाने कब की वहाँ के लोकल वाशिंदों के पेट में समा चुकी हैं।

आसाम में अधिकतर लोगों को मैंने खाना खाते वक्त वहीं अगल-बगल खखारकर थूकते देखा है, भले ही वे किसी रेस्टोरेंट में ही क्यों न बैठे हों।

नागालैंड में अगर गलती से आपने किसी ऐरे गैरे होटल में कमरा ले लिया तो आप गये काम से। अँधेरा घिरते ही खूबसूरत, जींस और टी शर्ट में कसी हुई लड़कियाँ आप से वसूली को आन पहुँचेगीं और आप की मजाल नहीं होगी कि आप उन्हें पैसा देने से इंकार कर दें।

कोहिमा, इम्फाल और आईजोल जैसी जगहों पर जो कि अपने स्टेट्स के कैपिटल हैं, अँधेरा घिरते ही यूँ सन्नाटा पसरना शुरू हो जाता है, जैसे वहाँ कर्फ्यू लगने वाला हो। दूर दराज के इलाकों की तो बात ही क्या, वहाँ तो शाम घिरने के बाद आपको आदम जात के दर्शन भी दुर्लभ हो जायेंगे।

गुवाहाटी में ऑटो और टैक्सी वाले दिन भर स्टैंड पर खाली खड़े रह सकते हैं मगर किराये में कोई समझौता करना उनको मंजूर नहीं होता। नतीजा ये होता है कि पहला मुर्गा फंसते ही दिन भर की वसूली की कवायद शुरू कर देते हैं।

 

Subscribe
Notify of
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x