जब पति पराया हो गया
मल्लिका सिंह ने कभी नहीं सोचा था कि जिस आदमी के साथ उसने सात फेरे लिए हैं, वही एक दिन उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाएगा। विवाह के शुरुआती वर्षों में सब कुछ सामान्य था। बृजेश सिंह एक सरकारी कर्मचारी था और मल्लिका अपने छोटे से परिवार में खुश रहने वाली साधारण महिला। समय के साथ दो बेटियों ने उनके घर को खुशियों से भर दिया।
लेकिन इंसान की इच्छाएँ अक्सर उसकी हैसियत से बड़ी होती हैं।
बृजेश भी उन्हीं लोगों में से था जो कम समय में अधिक धन और अधिक सुख चाहते हैं। नौकरी से मिलने वाली तनख्वाह अब उसे छोटी लगने लगी थी। जैसे-जैसे उसकी आर्थिक स्थिति सुधरती गई, उसके स्वभाव में भी बदलाव आने लगा।
त्रिपुरारी नगर में नया मकान बनने के बाद तो मानो वह पूरी तरह बदल गया।
जो आदमी कभी परिवार के साथ बैठकर खाना खाता था, अब देर रात घर लौटता था।
जो अपनी बेटियों को गोद में खिलाता था, अब छोटी-छोटी बातों पर उन पर चिल्लाने लगा था।
और जो पत्नी कभी उसकी दुनिया थी, अब वही उसे बोझ लगने लगी थी।
मल्लिका यह बदलाव देख रही थी।
वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर उसके पति को क्या हो गया है।
फिर एक दिन उसे जवाब मिल गया।
उस जवाब का नाम था—नीतू।
11 फरवरी 2010 की शाम त्रिपुरारी नगर कॉलोनी, सरोजनी नगर, लखनऊ में अचानक अफरा-तफरी मच गई।
एक घर के बाहर लोगों की भीड़ जमा थी। कुछ महिलाएँ आपस में फुसफुसा रही थीं, जबकि कई पुरुष घर के भीतर झाँकने की कोशिश कर रहे थे।
अंदर का दृश्य देखकर लोगों के चेहरे पीले पड़ गए थे।
बेडरूम के फर्श पर एक महिला रक्तरंजित अवस्था में पड़ी थी।
वह मल्लिका सिंह थी।
उसकी निश्चल देह देखकर कोई भी समझ सकता था कि यह साधारण मौत नहीं थी।
कुछ ही देर में पुलिस मौके पर पहुँच गई। सरोजनी नगर थाने की टीम ने घर को चारों तरफ से घेर लिया। धीरे-धीरे वरिष्ठ अधिकारी भी पहुँचने लगे।
पुलिस ने सबसे पहले घर का निरीक्षण किया।
आश्चर्य की बात यह थी कि घर का कोई सामान गायब नहीं था।
अलमारी खुली हुई थी, मगर जेवर और नकदी अपनी जगह मौजूद थे।
इससे साफ था कि हत्या का उद्देश्य लूटपाट नहीं था।
फिर सवाल उठता था—
आखिर मल्लिका की हत्या किसने और क्यों की?
उस समय किसी को अंदाजा भी नहीं था कि इस हत्या का सूत्रधार कोई बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि उसका अपना पति था।
*****
मल्लिका सिंह का जन्म प्रतापगढ़ जिले के एक साधारण परिवार में हुआ था।
वह सुंदर थी, मगर उससे भी ज्यादा सरल स्वभाव की थी।
घर के संस्कारों ने उसे सिखाया था कि विवाह के बाद पति और परिवार ही उसकी दुनिया होंगे।
इसी सोच के साथ 27 फरवरी 2002 को उसका विवाह लखनऊ निवासी बृजेश सिंह से हुआ।
बृजेश उस समय तहसील सदर में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था।
आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन नौकरी पक्की थी।
मल्लिका के माता-पिता को लगा कि उनकी बेटी का भविष्य सुरक्षित हाथों में चला गया है।
शादी के शुरुआती वर्ष सुखद रहे।
बृजेश अपनी पत्नी से प्रेम करता था।
मल्लिका भी पूरे मन से परिवार को संभालती थी।
कुछ वर्षों के भीतर दो बेटियों ने जन्म लिया।
शुभांजलि और त्रियांजलि।
बच्चियों के आने से घर में खुशियाँ बढ़ गईं।
उन दिनों बृजेश अपने चाचा के घर में रहता था।
संयुक्त परिवार का माहौल था।
घर के बड़े-बुजुर्ग मौजूद थे।
इसी वजह से बृजेश पर कुछ सामाजिक अंकुश भी था।
लेकिन इंसान की असली फितरत अक्सर तब सामने आती है जब उसे स्वतंत्रता और पैसा दोनों मिल जाएँ।
बृजेश के साथ भी यही हुआ।
समय बीतने लगा।
नौकरी के अलावा उसने कुछ और कामों में भी पैसा लगाना शुरू किया।
धीरे-धीरे उसकी आर्थिक स्थिति सुधरने लगी।
कुछ वर्षों में उसने इतनी बचत कर ली कि त्रिपुरारी नगर कॉलोनी में अपना मकान बनवा सके।
नया मकान बनना उसके जीवन का सबसे बड़ा सपना था।
जब परिवार नए घर में पहुँचा तो मल्लिका बहुत खुश थी।
उसे लगा कि अब संघर्ष के दिन पीछे छूट गए हैं।
लेकिन वास्तव में उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी मुश्किलें यहीं से शुरू हुईं।
नए घर में आने के कुछ ही महीनों बाद बृजेश बदलने लगा।
अब उसके व्यवहार में पहले जैसी सादगी नहीं थी।
वह अक्सर दोस्तों के साथ देर रात तक बैठने लगा।
शराब पीने की आदत भी बढ़ती गई।
धीरे-धीरे उसके भीतर एक अजीब सा घमंड पैदा हो गया।
वह छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगा।
कभी बच्चों पर चिल्लाता।
कभी पत्नी को अपमानित करता।
मल्लिका कई बार समझाने की कोशिश करती।
लेकिन हर बार उसे डाँट ही सुननी पड़ती।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसका पति आखिर इतना बदल क्यों गया है।
साल 2008 के आसपास बृजेश की जिंदगी में एक नया व्यक्ति आया।
उसका नाम था—नीतू सिंह।
नीतू की कहानी भी कम जटिल नहीं थी।
वह पहले से विवाहित थी, मगर पति से अलग रह रही थी।
स्वभाव से महत्वाकांक्षी और बेहद चालाक।
लोगों को प्रभावित करना वह अच्छी तरह जानती थी।
तहसील में आने-जाने के दौरान उसकी मुलाकात बृजेश से हुई।
शुरुआत सामान्य बातचीत से हुई।
फिर धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती हो गई।
बृजेश को नीतू का साथ अच्छा लगने लगा।
नीतू उसकी हर बात ध्यान से सुनती।
उसकी प्रशंसा करती।
उसे महत्वपूर्ण महसूस कराती।
उधर मल्लिका घर और बच्चों में व्यस्त रहती थी।
उसे नहीं मालूम था कि उसके पति की जिंदगी में कोई और जगह बना रहा है।
एक दिन तहसील से लौटते समय नीतू ने कहा—
“तुम बहुत मेहनत करते हो।”
बृजेश मुस्कुराया।
“और क्या करूँ?”
“लेकिन तुम्हारी कद्र कौन करता है?”
यह एक साधारण वाक्य था।
मगर यही वह वाक्य था जिसने बृजेश के मन में गहरी जगह बना ली।
उसे लगने लगा कि नीतू ही वह इंसान है जो उसे समझती है।
धीरे-धीरे दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगीं।
अब वे सिर्फ तहसील तक सीमित नहीं थे।
फोन पर घंटों बातें होतीं।
शहर के अलग-अलग इलाकों में मिलना-जुलना शुरू हो गया।
और फिर वह दिन भी आया जब बृजेश का मन अपने परिवार से ज्यादा नीतू में लगने लगा।
मल्लिका ने बदलाव महसूस करना शुरू कर दिया था।
बृजेश देर से घर आता।
फोन छिपाकर रखता।
कई बार बिना बताए गायब रहता।
एक रात मल्लिका ने पूछा—
“क्या बात है? तुम इतने बदले-बदले क्यों हो?”
बृजेश भड़क उठा।
“हर बात में शक मत किया करो।”
“मैं सिर्फ पूछ रही हूँ।”
“तुम्हें पूछने का कोई अधिकार नहीं।”
उस रात पहली बार उसने मल्लिका पर हाथ उठाया।
मल्लिका स्तब्ध रह गई।
जिस आदमी ने वर्षों तक उसे सम्मान दिया था, वही आज उसे अपमानित कर रहा था।
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
लेकिन उसने फिर भी घर बचाने की कोशिश जारी रखी।
उसे उम्मीद थी कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा।
उसे नहीं मालूम था कि हालात अब सुधार से बहुत आगे निकल चुके हैं।
उधर नीतू का प्रभाव बढ़ता जा रहा था।
बृजेश अब अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा उसी पर खर्च करने लगा।
कई बार वह घर का खर्च तक भूल जाता।
बेटियों की फीस देर से जमा होती।
मगर नीतू के लिए महंगे उपहार आते रहते।
जब मल्लिका विरोध करती तो झगड़ा होता।
धीरे-धीरे पूरा मोहल्ला इन बातों से परिचित होने लगा।
लोग आपस में चर्चा करते।
लेकिन कोई खुलकर कुछ नहीं कहता।
क्योंकि यह पति-पत्नी का मामला माना जाता था।
एक दिन मल्लिका ने साहस करके नीतू से मिलने का फैसला किया।
वह सीधे उसके घर पहुँच गई।
नीतू ने दरवाजा खोला।
दोनों कुछ क्षण तक एक-दूसरे को देखती रहीं।
मल्लिका ने शांत स्वर में कहा—
“मेरा घर मत तोड़ो।”
नीतू मुस्कुराई।
“घर अगर इतना मजबूत होता तो टूटता क्यों?”
यह सुनकर मल्लिका का दिल बैठ गया।
उसने महसूस कर लिया कि सामने खड़ी महिला पीछे हटने वाली नहीं है।
और यहीं से शुरू हुई वह लड़ाई, जिसका अंत एक हत्या में होने वाला था…
*****
मल्लिका जिस उम्मीद के सहारे नीतू के घर गई थी, वह उम्मीद लौटते समय पूरी तरह टूट चुकी थी।
उसे लग रहा था कि शायद आमने-सामने बातचीत करने पर नीतू पीछे हट जाएगी। शायद वह समझेगी कि उसके कारण एक परिवार बिखर रहा है। शायद उसे दो मासूम बच्चियों पर तरस आ जाएगा।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
नीतू की आंखों में उसे न तो अपराधबोध दिखाई दिया और न ही कोई झिझक।
उल्टा उसके चेहरे पर एक अजीब-सा आत्मविश्वास था।
मल्लिका समझ गई कि मामला अब साधारण नहीं रहा।
उसके पति और नीतू के बीच का संबंध इतना गहरा हो चुका था कि केवल समझाने-बुझाने से खत्म होने वाला नहीं था।
घर लौटने के बाद कई दिनों तक वह परेशान रही।
रात-रात भर जागती।
कभी बच्चों को सोते हुए देखती।
कभी अपने अतीत को याद करती।
उसे बार-बार वही दिन याद आते जब बृजेश उसके लिए घंटों इंतजार करता था।
जब छोटी-सी बीमारी पर भी घबरा जाता था।
जब बेटी के जन्म पर खुशी से मिठाइयां बांटी थीं।
क्या वही आदमी आज इतना बदल गया था?
या फिर वह कभी उसे समझ ही नहीं पाई थी?
इन सवालों का जवाब उसके पास नहीं था।
उधर बृजेश अब लगभग खुलकर नीतू के साथ घूमने लगा था।
पहले वह चोरी-छिपे मिलता था।
अब उसे किसी की परवाह नहीं थी।
शराब की लत भी बढ़ती जा रही थी।
कई बार रात के बारह-एक बजे घर लौटता।
मल्लिका कुछ पूछती तो झगड़ा शुरू हो जाता।
एक दिन तो बात इतनी बढ़ गई कि पड़ोसियों को बीच-बचाव के लिए आना पड़ा।
उस दिन पहली बार मोहल्ले वालों को समझ में आया कि इस घर की दीवारों के पीछे सब कुछ ठीक नहीं है।
पड़ोस में रहने वाली सावित्री देवी अक्सर मल्लिका को समझाती थीं।
“बेटी, थोड़ा धैर्य रखो। आदमी कभी-कभी भटक जाते हैं।”
मल्लिका कड़वी मुस्कान के साथ कहती—
“चाची, रास्ता भटकने वाला आदमी घर वापस आना चाहता है। लेकिन जो खुद घर छोड़ चुका हो, उसे कौन वापस लाएगा?”
सावित्री देवी के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता।
समय गुजरता गया।
इसी दौरान मल्लिका तीसरी बार गर्भवती हुई।
यह खबर सुनकर पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई।
दो बेटियों के बाद सबको बेटे की उम्मीद थी।
मल्लिका को लगा शायद आने वाला बच्चा परिवार को फिर से जोड़ देगा।
कई महिलाएं उसे यही समझातीं।
“बेटा हो जाएगा तो बृजेश सुधर जाएगा।”
“पुरुष आखिर परिवार की तरफ लौट ही आते हैं।”
“भगवान सब ठीक करेगा।”
मल्लिका भी इन बातों पर भरोसा करना चाहती थी।
लेकिन हकीकत इससे अलग थी।
जब मल्लिका गर्भवती थी, उसी दौरान नीतू का दबाव बढ़ने लगा।
उसे अब सिर्फ प्रेमिका बनकर रहना मंजूर नहीं था।
वह समाज में सम्मान चाहती थी।
पत्नी का दर्जा चाहती थी।
और सबसे बढ़कर, वह बृजेश को पूरी तरह अपने कब्जे में रखना चाहती थी।
एक शाम उसने साफ शब्दों में कहा—
“तुम्हें फैसला करना होगा।”
बृजेश चौंका।
“किस बात का?”
“मेरे और मल्लिका में से किसी एक को चुनना होगा।”
बृजेश कुछ देर चुप रहा।
“इतनी जल्दी क्या है?”
“जल्दी नहीं है। मैं कई साल से इंतजार कर रही हूं।”
“लेकिन बच्चे हैं…”
“मुझे बच्चों से कोई समस्या नहीं।”
नीतू की आवाज अचानक कठोर हो गई।
“समस्या तुम्हारी पत्नी है।”
बृजेश चुप हो गया।
उसकी खामोशी ही सबसे बड़ा जवाब थी।
नीतू समझ चुकी थी कि बृजेश उसके प्रभाव में पूरी तरह आ चुका है।
अब उसे केवल अंतिम कदम उठाना था।
धीरे-धीरे उसने बृजेश के मन में जहर घोलना शुरू कर दिया।
“मल्लिका तुम्हें समझती नहीं।”
“वह तुम्हारे खिलाफ लोगों को भड़काती है।”
“तुम्हारी कमाई पर जीती है और तुम्हारी इज्जत नहीं करती।”
ऐसी बातें वह बार-बार दोहराती।
पहले बृजेश विरोध करता।
फिर सुनता रहा।
फिर मानने लगा।
और आखिरकार उसे सच समझने लगा।
यही मनोवैज्ञानिक खेल था जिसमें नीतू माहिर थी।
इस बीच मल्लिका ने एक बेटे को जन्म दिया।
घर में जश्न मनाया गया।
बच्चे का नाम रखा गया—सूर्यांश।
मल्लिका की आंखों में फिर उम्मीद लौट आई।
उसने सोचा अब सब बदल जाएगा।
लेकिन बच्चे के जन्म के बाद भी बृजेश का व्यवहार नहीं बदला।
बल्कि अब वह पहले से ज्यादा घर से दूर रहने लगा।
कई बार तो पूरा दिन नीतू के साथ बिताता।
एक शाम मल्लिका ने बेटे को गोद में लेकर कहा—
“देखो, तुम्हारा बेटा है। उसके लिए ही सही, अपनी जिंदगी बदल लो।”
बृजेश ने बच्चे की तरफ देखा।
कुछ क्षणों के लिए उसके चेहरे पर नरमी आई।
लेकिन अगले ही पल वह उठकर बाहर चला गया।
उसका मन अब परिवार से ज्यादा कहीं और बस चुका था।
उधर नीतू का धैर्य खत्म होता जा रहा था।
उसे डर था कि कहीं बृजेश फिर परिवार की तरफ न लौट जाए।
इसलिए उसने निर्णायक कदम उठाने का फैसला कर लिया।
एक रात दोनों शहर के एक सुनसान इलाके में मिले।
नीतू ने कहा—
“अगर मल्लिका नहीं रही तो?”
बृजेश ने चौंककर उसकी तरफ देखा।
“क्या मतलब?”
“मतलब साफ है।”
कुछ क्षण तक सन्नाटा छाया रहा।
बृजेश ने कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन उसने विरोध भी नहीं किया।
यही वह पल था जब एक खतरनाक विचार ने जन्म लिया।
आने वाले दिनों में दोनों अक्सर इसी विषय पर चर्चा करने लगे।
शुरुआत में यह केवल कल्पना थी।
फिर संभावना बनी।
और धीरे-धीरे योजना का रूप लेने लगी।
नीतू के कुछ दूर के रिश्तेदार अपराधी प्रवृत्ति के थे।
उनमें से एक का नाम शेर बहादुर था।
उसका नाम इलाके के कई पुराने मामलों में आ चुका था।
नीतू जानती थी कि अगर किसी को पैसों का लालच दिया जाए तो वह किसी भी हद तक जा सकता है।
एक दिन उसने शेर बहादुर से मुलाकात की।
वह मुलाकात साधारण नहीं थी।
वहीं पहली बार मल्लिका को रास्ते से हटाने की बात खुलकर हुई।
कुछ दिनों बाद शेर बहादुर अपने दो साथियों के साथ त्रिपुरारी नगर पहुंचा।
उन्हें मजदूरों के रूप में पेश किया गया।
बृजेश ने स्वयं मल्लिका से उनका परिचय कराया।
“घर में कुछ मरम्मत और पुताई का काम होना है।”
मल्लिका को कोई संदेह नहीं हुआ।
वह कैसे सोच सकती थी कि जिन लोगों को उसका पति घर में ला रहा है, वही उसकी मौत का कारण बनने वाले हैं?
अब योजना लगभग तैयार थी।
बस सही समय का इंतजार था।
ऐसा समय जब बृजेश घर पर न हो।
जब आसपास किसी को शक न हो।
और जब मल्लिका पूरी तरह असावधान हो।
फरवरी 2010 की शुरुआत तक सब कुछ तय हो चुका था।
हत्यारे तैयार थे।
नीतू तैयार थी।
और सबसे भयावह बात—
मल्लिका को इस आने वाले तूफान की जरा भी खबर नहीं थी।
उसे लगता था कि वह अपने परिवार को बचाने की लड़ाई लड़ रही है।
जबकि दूसरी तरफ उसके खिलाफ मौत की साजिश बुनी जा चुकी थी।
11 फरवरी की तारीख तय हो चुकी थी।
और अब उस तारीख का इंतजार किया जा रहा था, जो त्रिपुरारी नगर के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज होने वाली थी…
*****
11 फरवरी 2010
यह तारीख मल्लिका सिंह की जिंदगी की आखिरी सुबह लेकर आई थी।
उस दिन की शुरुआत भी किसी सामान्य दिन की तरह हुई थी।
सुबह जल्दी उठकर उसने घर के काम निपटाए। बेटियों को स्कूल के लिए तैयार किया। पांच महीने के सूर्यांश को नहलाया-धुलाया और फिर रसोई में लग गई।
उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि शाम होने से पहले उसकी दुनिया हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।
दूसरी ओर बृजेश सुबह से ही असामान्य रूप से बेचैन था।
रात भर वह ठीक से सो नहीं पाया था।
बार-बार उसकी नजर घड़ी पर जा रही थी।
एक तरफ वह उस रास्ते पर बढ़ चुका था, जहां से वापसी संभव नहीं थी।
दूसरी तरफ उसके भीतर कहीं न कहीं भय भी मौजूद था।
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
नीतू, शेर बहादुर और उसके साथियों के साथ योजना कई दिनों से बन चुकी थी।
अब पीछे हटना उसके लिए आसान नहीं था।
सुबह करीब नौ बजे नीतू का फोन आया।
“सब तय है?”
नीतू ने पूछा।
“हां।”
“कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए।”
“नहीं होगी।”
“आज के बाद कोई हमारे बीच नहीं आएगा।”
फोन कट गया।
बृजेश कुछ देर तक मोबाइल को देखता रहा।
फिर उसने गहरी सांस ली और बाहर निकल गया।
योजना के अनुसार उसे उस समय घर से दूर रहना था।
इसलिए उसने पहले से ही एक बहाना तैयार कर रखा था।
अपने बहनोई विनोद सिंह के साथ वह एक जमीन की रजिस्ट्री के सिलसिले में रजिस्ट्रार कार्यालय जाने वाला था।
वह जानता था कि बाद में यही बात उसके बचाव का आधार बनेगी।
अगर कोई पूछेगा तो वह कह सकेगा—
“मैं तो उस समय वहां था ही नहीं।”
लेकिन अपराध की दुनिया में अक्सर सबसे बड़ी गलती यही होती है कि अपराधी खुद को बहुत ज्यादा चतुर समझने लगता है।
करीब ग्यारह बजे के आसपास मल्लिका घर में अकेली थी।
दोनों बेटियां स्कूल जा चुकी थीं।
सूर्यांश उसकी गोद में खेल रहा था।
उसने बच्चे को दूध पिलाया और फिर टीवी चलाकर बैठ गई।
घर में सामान्य शांति थी।
उधर अमौसी रेलवे स्टेशन के पास तीन लोग मिले।
बबुआ त्रिवेदी।
नरेन्द्र लोध उर्फ लाला।
और कमलेश पासी।
तीनों को पहले ही पूरी योजना समझा दी गई थी।
उन्हें बताया गया था कि घर में एक महिला होगी।
काम जल्दी करना है।
और बिना किसी शोर-शराबे के निकल जाना है।
उनके लिए यह कोई पहली घटना नहीं थी।
लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम था कि यही हत्या आगे चलकर उनके लिए भी मुसीबत बन जाएगी।
तीनों दोपहर के समय त्रिपुरारी नगर पहुंचे।
उनके हाथों में रेगमाल और कुछ औजार थे।
बिल्कुल मजदूरों जैसे दिख रहे थे।
दरवाजा मल्लिका ने खोला।
“कौन?”
“भाभी जी, बृजेश भैया ने भेजा है। पुताई का काम देखना था।”
मल्लिका ने बिना किसी संदेह के उन्हें अंदर आने दिया।
आखिर उनका परिचय पहले ही कराया जा चुका था।
कुछ देर तक तीनों ने काम करने का नाटक किया।
एक कमरे में रेगमाल रगड़ते रहे।
दीवारों को देखते रहे।
बीच-बीच में आपस में बातें करते रहे।
मल्लिका को कोई शक नहीं हुआ।
वह सूर्यांश को लेकर दूसरे कमरे में चली गई।
टीवी चल रहा था।
बच्चा उसकी गोद में था।
उसे लग रहा था कि मजदूर अपना काम कर रहे हैं।
यही वह क्षण था जिसका इंतजार हत्यारे कर रहे थे।
तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
फिर धीरे-धीरे उस कमरे की तरफ बढ़े जहां मल्लिका बैठी थी।
उनके कदमों की आवाज तक नहीं हुई।
मल्लिका का ध्यान टीवी पर था।
अचानक उसे पीछे किसी की आहट महसूस हुई।
उसने मुड़कर देखा।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
कमरे के भीतर कुछ ही मिनटों में सब कुछ खत्म हो गया।
मल्लिका को संभलने या मदद मांगने का मौका तक नहीं मिला।
घर के बाहर किसी को कोई आवाज सुनाई नहीं दी।
कुछ देर बाद तीनों उसी तरह बाहर निकले जैसे आए थे।
शांत।
सामान्य।
और बिना किसी घबराहट के।
उनके कपड़ों पर कोई ऐसा निशान नहीं था जिससे कोई शक करता।
कुछ ही देर में वे वहां से निकल चुके थे।
घर के भीतर अब केवल सन्नाटा था।
टीवी चल रहा था।
पंखा घूम रहा था।
और पांच महीने का मासूम सूर्यांश अपनी मां के पास रो रहा था।
उसे क्या पता था कि उसकी दुनिया अभी-अभी उजड़ चुकी है।
उधर रजिस्ट्रार कार्यालय में बैठा बृजेश बार-बार मोबाइल देख रहा था।
समय बीत रहा था।
लेकिन कोई सूचना नहीं आ रही थी।
उसकी बेचैनी बढ़ने लगी।
उसे डर लगने लगा कि कहीं योजना असफल तो नहीं हो गई।
कहीं किसी ने पकड़ तो नहीं लिया।
कहीं मल्लिका बच तो नहीं गई।
कई तरह के विचार उसके मन में दौड़ रहे थे।
आखिर उसने खुद ही एक कदम उठाया।
उसने कॉलोनी के चौकीदार राकेश को फोन किया।
“जरा घर जाकर देखो।”
राकेश हैरान हुआ।
“क्यों?”
“कुछ मेहमान आने वाले हैं। मल्लिका से कह देना खाना तैयार रखे।”
राकेश को बात थोड़ी अजीब लगी।
बृजेश ने पहले कभी ऐसा फोन नहीं किया था।
लेकिन उसने ज्यादा सवाल नहीं किए।
कुछ मिनट बाद राकेश घर पहुंचा।
दरवाजा आधा खुला हुआ था।
उसने आवाज लगाई—
“भाभी जी!”
कोई जवाब नहीं आया।
वह अंदर गया।
फिर बेडरूम की तरफ बढ़ा।
अगले ही क्षण उसकी चीख निकल गई।
उसने तुरंत बाहर आकर लोगों को बुलाया।
मोहल्ले में हड़कंप मच गया।
सूचना पुलिस तक पहुंची।
कुछ ही देर में थाना सरोजनी नगर की टीम मौके पर थी।
प्रारंभिक जांच शुरू हुई।
पहली नजर में ही पुलिस को लगा कि मामला साधारण नहीं है।
घर में कोई लूट नहीं हुई थी।
जबरन प्रवेश के निशान नहीं थे।
मतलब हत्यारे या तो परिचित थे या उन्हें घर में आसानी से प्रवेश मिला था।
शाम होते-होते बृजेश भी वहां पहुंच गया।
वह रोने का नाटक कर रहा था।
कभी सिर पकड़कर बैठ जाता।
कभी लोगों से लिपटकर रोता।
लेकिन कुछ पुलिसकर्मियों को उसका व्यवहार स्वाभाविक नहीं लगा।
खासकर इसलिए क्योंकि घटना की सूचना मिलने से पहले ही उसने चौकीदार को घर भेजा था।
यह बात कई अधिकारियों के मन में खटक गई।
रात तक पुलिस ने बृजेश, विनोद और कुछ अन्य लोगों से पूछताछ शुरू कर दी।
शुरुआती संदेह गहराने लगा था।
लेकिन तभी एक अप्रत्याशित मोड़ आया।
देर रात किसी प्रभावशाली व्यक्ति का फोन आया।
उसके बाद जांच की दिशा अचानक बदल गई।
और जिन लोगों से पूछताछ हो रही थी, उन्हें छोड़ दिया गया।
ऐसा लगा मानो मामला दबा दिया जाएगा।
लेकिन अपराध चाहे कितना भी सुनियोजित क्यों न हो—
वह हमेशा कोई न कोई निशान छोड़ जाता है।
और इस मामले में भी कुछ ऐसे सुराग मौजूद थे जो आने वाले दिनों में बृजेश की पूरी साजिश को उजागर करने वाले थे।
पुलिस भले उस रात खाली हाथ लौटी हो…
लेकिन असली जांच अब शुरू होने वाली थी।
*****
मल्लिका सिंह की हत्या के बाद पूरे लखनऊ में इस घटना की चर्चा होने लगी थी।
त्रिपुरारी नगर कॉलोनी में रहने वाले लोग स्तब्ध थे।
जो भी इस परिवार को जानता था, उसके मन में एक ही सवाल था—
आखिर मल्लिका की हत्या किसने की?
पुलिस के सामने भी यही प्रश्न था।
पहली नजर में यह हत्या किसी पेशेवर गिरोह का काम लग रही थी, लेकिन घटनास्थल पर मौजूद परिस्थितियां कुछ और ही कहानी कह रही थीं।
हत्या के अगले दिन पुलिस ने फिर से पूरे घर का निरीक्षण किया।
फॉरेंसिक टीम ने बारीकी से हर कमरे की जांच की।
दरवाजों, खिड़कियों और फर्श तक का परीक्षण किया गया।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य वही था—
घर में लूटपाट नहीं हुई थी।
अलमारी में रखे जेवर सुरक्षित थे।
नकदी भी गायब नहीं थी।
महंगे सामान भी अपनी जगह मौजूद थे।
इसका मतलब साफ था।
हत्यारों का मकसद चोरी नहीं था।
उनका निशाना सिर्फ मल्लिका थी।
जांच अधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हत्या व्यक्तिगत दुश्मनी या किसी गहरी साजिश का परिणाम हो सकती है।
अब पुलिस ने मल्लिका के पारिवारिक जीवन की पड़ताल शुरू की।
यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया।
पड़ोसियों से पूछताछ में एक ही बात बार-बार सामने आई।
बृजेश और मल्लिका के बीच अक्सर झगड़े होते थे।
कई लोगों ने बताया कि बृजेश शराब पीता था।
कुछ लोगों ने यह भी बताया कि उसके घर पर एक महिला का आना-जाना था।
उस महिला का नाम था—
नीतू सिंह।
यह नाम पहली बार पुलिस की केस डायरी में दर्ज हुआ।
जांच अधिकारी ने तुरंत नीतू के बारे में जानकारी जुटानी शुरू कर दी।
पता चला कि नीतू का बृजेश से लंबे समय से संपर्क था।
दोनों अक्सर एक साथ देखे जाते थे।
कई लोगों का मानना था कि दोनों के बीच सामान्य दोस्ती से कहीं अधिक गहरा रिश्ता था।
अब पुलिस का ध्यान पूरी तरह नीतू की ओर केंद्रित होने लगा।
इसी दौरान सर्विलांस टीम ने काम शुरू किया।
हत्या से पहले और बाद के मोबाइल कॉल रिकॉर्ड निकाले गए।
जब कॉल डिटेल रिपोर्ट सामने आई तो जांच अधिकारी चौंक गए।
हत्या से पहले के दिनों में बृजेश और नीतू के बीच असामान्य रूप से लंबी और लगातार बातचीत हुई थी।
घटना वाले दिन भी कई बार दोनों के बीच संपर्क हुआ था।
यह कोई साधारण बात नहीं थी।
एक अधिकारी ने फाइल बंद करते हुए कहा—
“यह मामला जितना दिख रहा है, उससे कहीं ज्यादा गहरा है।”
दूसरे अधिकारी ने जवाब दिया—
“मुझे लगता है हत्या की जड़ परिवार के भीतर ही है।”
अब पुलिस ने नीतू की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू कर दी।
उधर नीतू को भी महसूस होने लगा था कि पुलिस उसके करीब पहुंच रही है।
वह बार-बार बृजेश को फोन करती।
“पुलिस कहीं मेरे पास न पहुंच जाए।”
“घबराओ मत।”
बृजेश कहता।
“हमारे खिलाफ कोई सबूत नहीं है।”
लेकिन वास्तव में वह खुद अंदर से घबराया हुआ था।
चार दिन बीत चुके थे।
जांच लगातार आगे बढ़ रही थी।
15 फरवरी की सुबह पुलिस को एक महत्वपूर्ण सूचना मिली।
एक मुखबिर ने दावा किया कि हत्या में शामिल लोगों के बारे में उसे कुछ जानकारी है।
यह सूचना इतनी महत्वपूर्ण थी कि तत्काल विशेष टीम गठित की गई।
मुखबिर ने बताया कि कुछ दिन पहले कुछ संदिग्ध लोग त्रिपुरारी नगर में देखे गए थे।
वे मजदूरों के वेश में आए थे।
लेकिन वास्तव में उनका उद्देश्य कुछ और था।
यह जानकारी पुलिस के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई।
अब जांच सीधे उन लोगों तक पहुंच रही थी जिन्हें हत्या के लिए इस्तेमाल किया गया था।
उधर पुलिस ने एक बार फिर बृजेश को हिरासत में लेने का फैसला किया।
इस बार पूछताछ पहले से कहीं अधिक सख्त थी।
बृजेश को विश्वास था कि वह पुलिस को भ्रमित कर देगा।
लेकिन जांच अधिकारी भी अनुभवी थे।
उन्होंने एक-एक कर सारे तथ्य उसके सामने रख दिए।
कॉल रिकॉर्ड।
गवाहों के बयान।
नीतू से उसके संबंध।
चौकीदार को किया गया फोन।
और मजदूरों के रूप में घर आए संदिग्ध लोग।
पूछताछ का कमरा कुछ देर तक खामोश रहा।
फिर अधिकारी ने सीधे पूछा—
“बृजेश, सच बताओ।”
“मैंने कुछ नहीं किया।”
बृजेश बोला।
“तुम्हारी पत्नी की हत्या हुई और तुम कहते हो तुम्हें कुछ नहीं पता?”
“मुझे नहीं मालूम।”
“फिर नीतू से इतनी बातें क्यों हुईं?”
बृजेश चुप हो गया।
घंटों तक पूछताछ चलती रही।
उसकी बातें बार-बार बदल रही थीं।
एक बयान दूसरे से मेल नहीं खा रहा था।
अब पुलिस को लगभग विश्वास हो गया था कि वह कुछ छिपा रहा है।
उधर दूसरी टीम नीतू तक पहुंच चुकी थी।
जब उससे पूछताछ की गई तो उसने पहले सब कुछ नकार दिया।
लेकिन पुलिस के पास अब पर्याप्त जानकारी थी।
हर सवाल के साथ उसका आत्मविश्वास कम होता जा रहा था।
शाम तक पुलिस को यह समझ में आ चुका था कि हत्या कोई अचानक हुई घटना नहीं थी।
यह एक सुनियोजित साजिश थी।
एक ऐसी साजिश जिसमें कई लोग शामिल थे।
और उसका केंद्र बिंदु था—
बृजेश सिंह।
15 फरवरी की रात तक पुलिस ने दोबारा गिरफ्तारी की कार्रवाई शुरू कर दी।
त्रिपुरारी नगर स्थित घर से बृजेश को हिरासत में लिया गया।
जब पुलिस उसे ले जा रही थी तो मोहल्ले के लोग बाहर खड़े थे।
कई लोगों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक पति अपनी पत्नी की हत्या की साजिश रच सकता है।
लेकिन पुलिस अब लगभग पूरी कहानी समझ चुकी थी।
बस कुछ कड़ियां जोड़ना बाकी था।
और वे कड़ियां अगले चंद घंटों में जुड़ने वाली थीं।
क्योंकि जल्द ही उन लोगों से भी पूछताछ होने वाली थी जिन्होंने मजदूर बनकर घर में प्रवेश किया था।
और वही लोग इस पूरे षड्यंत्र का सबसे बड़ा रहस्य खोलने वाले थे।
*****
15 फरवरी की रात सरोजनी नगर थाने का माहौल असामान्य रूप से गंभीर था।
मल्लिका हत्याकांड अब एक साधारण हत्या का मामला नहीं रह गया था। पुलिस को विश्वास हो चुका था कि इसके पीछे कोई गहरी साजिश है और उस साजिश की डोर सीधे बृजेश सिंह तक जाती है।
लेकिन कानून केवल शक के आधार पर नहीं चलता।
पुलिस को ऐसे सबूत चाहिए थे जो अदालत में भी टिक सकें।
इसीलिए जांच अधिकारी हर कदम बेहद सावधानी से उठा रहे थे।
बृजेश को हिरासत में लेकर लगातार पूछताछ की जा रही थी।
पहले दिन उसने खुद को पूरी तरह निर्दोष बताया।
उसका कहना था कि घटना के समय वह रजिस्ट्री कार्यालय में मौजूद था और उसकी पत्नी की हत्या से उसका कोई लेना-देना नहीं है।
कागजों में भी उसका अलिबी मजबूत दिखाई देता था।
रजिस्ट्रार कार्यालय में उसकी मौजूदगी दर्ज थी।
बहनोई विनोद सिंह भी उसके साथ था।
लेकिन पुलिस को यह समझने में देर नहीं लगी कि यह अलिबी पहले से तैयार किया गया था।
जांच अधिकारी ने एक दिन पूछताछ के दौरान कहा—
“तुम बहुत चालाक बनने की कोशिश कर रहे हो, बृजेश।”
बृजेश चुप रहा।
“लेकिन हर अपराधी एक गलती जरूर करता है।”
इस बार भी बृजेश ने कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन उसके चेहरे पर उभरती बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी।
उधर पुलिस ने उन लोगों की तलाश तेज कर दी थी जिन्हें मजदूर बनाकर घर भेजा गया था।
मुखबिरों का जाल बिछाया गया।
मोबाइल लोकेशन खंगाली गई।
पुराने अपराधियों के रिकॉर्ड निकाले गए।
और आखिरकार जांच टीम उन्नाव जिले के अचलगंज क्षेत्र तक पहुंच गई।
यहीं से कहानी की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मिली।
पुलिस को पता चला कि बबुआ त्रिवेदी उर्फ सागर त्रिवेदी, नरेन्द्र लोध उर्फ लाला और कमलेश पासी घटना के बाद अचानक गायब हो गए थे।
यह जानकारी अपने आप में बहुत कुछ कह रही थी।
जल्द ही तीनों को हिरासत में ले लिया गया।
शुरुआती पूछताछ में तीनों ने कुछ भी स्वीकार नहीं किया।
लेकिन पुलिस के पास पहले से पर्याप्त जानकारी थी।
अलग-अलग कमरों में बैठाकर उनसे पूछताछ की गई।
उनके बयानों का मिलान किया गया।
और फिर उनके जवाबों में विरोधाभास सामने आने लगा।
एक ने कहा वह घटना वाले दिन गांव में था।
दूसरे ने कहा शहर में था।
तीसरे ने कहा कि उसे कुछ याद नहीं।
लेकिन पुलिस को अब यकीन हो गया था कि वे झूठ बोल रहे हैं।
लगातार पूछताछ के दबाव में आखिरकार सबसे पहले कमलेश टूट गया।
उसने स्वीकार कर लिया कि वह त्रिपुरारी नगर गया था।
उसने यह भी बताया कि उन्हें मजदूर बनकर घर में प्रवेश करने को कहा गया था।
इसके बाद जैसे पूरी कहानी सामने आने लगी।
कमलेश के बयान के बाद बबुआ और नरेन्द्र से दोबारा पूछताछ हुई।
अब उनके पास झूठ बोलने की गुंजाइश कम थी।
धीरे-धीरे तीनों ने साजिश की पुष्टि कर दी।
उन्होंने बताया कि उन्हें मल्लिका को रास्ते से हटाने के लिए भेजा गया था।
और यह योजना अचानक नहीं बनी थी।
इसके पीछे कई दिनों की तैयारी थी।
जब यह जानकारी जांच अधिकारी तक पहुंची तो उन्होंने तुरंत बृजेश से दोबारा पूछताछ शुरू की।
अबकी बार उसके सामने उन लोगों के बयान रखे गए।
बृजेश का चेहरा पीला पड़ गया।
वह समझ गया कि साजिश का पर्दाफाश हो चुका है।
पूछताछ के दौरान अधिकारी ने कहा—
“अब भी सच नहीं बताओगे?”
कुछ देर तक कमरे में खामोशी छाई रही।
फिर बृजेश ने सिर झुका लिया।
यह पहली बार था जब उसका आत्मविश्वास टूटता दिखाई दिया।
कई घंटों बाद उसने स्वीकार किया कि नीतू के साथ उसके संबंध थे।
उसने माना कि वह मल्लिका से छुटकारा चाहता था।
हालांकि उसने शुरुआत में हत्या की सीधी जिम्मेदारी लेने से बचने की कोशिश की।
लेकिन जैसे-जैसे सबूत सामने आते गए, उसकी कहानी बिखरती चली गई।
उधर नीतू से भी लगातार पूछताछ हो रही थी।
वह शुरू में खुद को केवल एक परिचित बताती रही।
लेकिन जब पुलिस ने कॉल रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और अन्य जानकारी सामने रखी तो उसकी स्थिति कमजोर पड़ गई।
अब जांच एजेंसियों को स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि यह हत्या भावनात्मक आवेश में नहीं, बल्कि सुनियोजित षड्यंत्र के तहत की गई थी।
पुलिस ने अपनी चार्जशीट तैयार करनी शुरू कर दी।
इसमें हत्या की पूरी साजिश का क्रमवार विवरण दर्ज किया गया।
कैसे बृजेश और नीतू के बीच संबंध बने।
कैसे मल्लिका उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बन गई।
कैसे बाहरी लोगों की मदद ली गई।
और कैसे एक सुनियोजित योजना के तहत हत्या को अंजाम दिया गया।
जब यह खबर त्रिपुरारी नगर पहुंची तो लोग स्तब्ध रह गए।
कई लोगों को अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि एक पति अपनी पत्नी की हत्या की साजिश रच सकता है।
मल्लिका को जानने वाले लोग उसकी सरलता और सहनशीलता की चर्चा करते थे।
वहीं बृजेश का नाम अब पूरे इलाके में नफरत और अविश्वास के साथ लिया जाने लगा।
सबसे दर्दनाक स्थिति उन तीन बच्चों की थी।
दो बेटियां, जिन्होंने अपनी मां को खो दिया था।
और छोटा सूर्यांश, जिसे शायद कभी ठीक से यह भी याद नहीं रहेगा कि उसकी मां कैसी दिखती थी।
अपराध की कीमत आखिरकार सबसे ज्यादा मासूम लोगों को ही चुकानी पड़ती है।
इस मामले में भी ऐसा ही हुआ।
कुछ महीनों बाद मामला अदालत पहुंचा।
पुलिस ने अपने सभी साक्ष्य न्यायालय के सामने प्रस्तुत किए।
गवाहों के बयान दर्ज हुए।
फॉरेंसिक रिपोर्ट पेश की गई।
और धीरे-धीरे मुकदमा अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ने लगा।
लेकिन अदालत का फैसला आने से पहले ही समाज ने इस घटना पर अपना फैसला सुना दिया था।
लोगों की नजर में यह केवल एक हत्या नहीं थी।
यह विश्वास, विवाह और परिवार के साथ किया गया सबसे बड़ा विश्वासघात था।
और इसी विश्वासघात ने एक पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया।
*****
मल्लिका हत्याकांड की गूंज अब केवल सरोजनी नगर या लखनऊ तक सीमित नहीं रही थी। मामला मीडिया की सुर्खियां बन चुका था। अखबारों में रोज नई-नई खबरें छप रही थीं। लोग चाय की दुकानों, दफ्तरों और मोहल्लों में इसी घटना की चर्चा कर रहे थे।
हर किसी के मन में एक ही सवाल था—क्या सचमुच एक पति अपनी पत्नी की हत्या की साजिश सिर्फ इसलिए रच सकता है कि वह दूसरी महिला के साथ जीवन बिताना चाहता था?
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने अदालत में विस्तृत आरोपपत्र दाखिल कर दिया। आरोपपत्र में बृजेश सिंह, नीतू सिंह तथा हत्या में शामिल अन्य लोगों के नाम शामिल थे। पुलिस ने दावा किया कि यह हत्या अचानक हुए किसी झगड़े का परिणाम नहीं थी, बल्कि कई सप्ताह पहले बनाई गई सुनियोजित साजिश का नतीजा थी।
मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई।
अदालत में सबसे पहले पुलिस अधिकारियों ने अपने बयान दर्ज कराए। उन्होंने बताया कि किस प्रकार घटनास्थल से मिले सुरागों ने उन्हें बृजेश तक पहुंचाया।
जांच अधिकारी ने अदालत को बताया कि शुरू से ही उन्हें बृजेश के व्यवहार पर संदेह था। पत्नी की हत्या की खबर सुनने के बाद भी उसके चेहरे पर वैसा दुःख दिखाई नहीं दिया था, जैसा सामान्य परिस्थितियों में होना चाहिए था।
इसके अलावा उसके कई बयान आपस में मेल नहीं खाते थे।
इसके बाद कॉल डिटेल रिकॉर्ड अदालत के सामने प्रस्तुत किए गए।
उन रिकॉर्डों से साबित हुआ कि घटना से पहले और बाद में बृजेश तथा नीतू के बीच लगातार बातचीत हुई थी।
इतना ही नहीं, हत्या में शामिल लोगों से भी कई बार संपर्क किया गया था।
ये तथ्य अभियोजन पक्ष के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए।
मोहल्ले के कई लोगों ने भी गवाही दी।
एक महिला ने अदालत को बताया—
“मल्लिका अक्सर रोती रहती थी। वह कहती थी कि उसके पति का किसी दूसरी औरत से संबंध है और वह उसे छोड़ना चाहता है।”
एक अन्य पड़ोसी ने बताया कि पति-पत्नी के बीच अक्सर झगड़े होते थे।
इन गवाहियों ने अभियोजन के दावे को और मजबूत कर दिया।
फिर अदालत में वह चौकीदार राकेश भी पेश हुआ जिसे घटना वाले दिन बृजेश ने फोन करके घर भेजा था।
राकेश ने कहा—
“साहब, बृजेश बाबू ने मुझे पहले कभी इस तरह फोन नहीं किया था। उस दिन अचानक उन्होंने कहा कि घर जाकर देखो और खाना बनवाने की बात कह दो।”
राकेश की यह गवाही भी महत्वपूर्ण साबित हुई।
अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि बृजेश हत्या की पुष्टि करवाना चाहता था, इसलिए उसने चौकीदार को वहां भेजा था।
मुकदमे के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा उन तीन लोगों के बयानों की हुई जिन्हें मजदूर बनाकर घर भेजा गया था।
उन्होंने अदालत में स्वीकार किया कि उन्हें घर में प्रवेश दिलाने की व्यवस्था पहले से की गई थी।
हालांकि बचाव पक्ष ने उनके बयानों को अविश्वसनीय साबित करने की कोशिश की, लेकिन अन्य साक्ष्यों ने उनकी बातों की पुष्टि कर दी।
उधर नीतू सिंह लगातार खुद को निर्दोष साबित करने का प्रयास करती रही।
उसका कहना था कि वह केवल बृजेश की परिचित थी और हत्या की योजना के बारे में उसे कुछ भी पता नहीं था।
लेकिन जांच में मिले कई तथ्यों ने उसके दावों को कमजोर कर दिया।
अदालत ने पाया कि वह पूरी तरह अनजान नहीं हो सकती थी।
सुनवाई कई महीनों तक चलती रही।
हर तारीख पर मल्लिका के मायके वाले अदालत पहुंचते।
उनकी आंखों में आज भी वही सवाल था—जिस बेटी को उन्होंने हंसी-खुशी विदा किया था, उसका कसूर क्या था?
उधर बृजेश के परिवार के लोग भी परेशान थे।
उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह आदमी, जिसे वे वर्षों से जानते थे, इतना बड़ा कदम कैसे उठा सकता है।
इन सबके बीच सबसे अधिक प्रभावित हुए बच्चे।
शुभांजलि और त्रियांजलि अब पहले से ज्यादा चुप रहने लगी थीं।
स्कूल में दूसरे बच्चे उनसे तरह-तरह के सवाल पूछते।
कई बार वे रो पड़तीं।
उन्हें अपनी मां की कमी तो खलती ही थी, साथ ही यह सच भी परेशान करता था कि उनके पिता हत्या के आरोपी बन चुके थे।
छोटा सूर्यांश तो अभी इतना छोटा था कि उसे कुछ समझ नहीं आता था।
लेकिन उसकी जिंदगी भी इस अपराध ने हमेशा के लिए बदल दी थी।
आखिरकार वह दिन भी आया जब अदालत ने अपना फैसला सुनाया।
अदालत ने कहा कि प्रस्तुत साक्ष्य, गवाहों के बयान और परिस्थितिजन्य प्रमाण यह साबित करते हैं कि मल्लिका की हत्या एक सुनियोजित षड्यंत्र का परिणाम थी।
फैसला सुनते समय अदालत कक्ष में गहरा सन्नाटा छाया हुआ था।
बृजेश सिर झुकाए खड़ा था।
नीतू की आंखों में भी घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।
फैसले के बाद पुलिस अधिकारियों ने राहत की सांस ली।
महीनों की मेहनत आखिरकार सफल हुई थी।
लेकिन किसी भी पुलिस अधिकारी के चेहरे पर खुशी नहीं थी।
क्योंकि वे जानते थे कि न्याय मिलने के बाद भी मल्लिका वापस नहीं आएगी।
एक परिवार जो कभी हंसता-खेलता था, अब हमेशा के लिए बिखर चुका था।
मल्लिका की मौत के बाद उसके मायके वालों ने बच्चों की जिम्मेदारी संभालने की कोशिश की।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।
घाव भले पूरी तरह नहीं भरे, लेकिन जिंदगी रुकती भी नहीं।
बच्चों ने पढ़ाई जारी रखी और नई परिस्थितियों में खुद को ढालने का प्रयास किया।
इस पूरी घटना ने एक बार फिर यह साबित किया कि जब इंसान अपनी इच्छाओं और स्वार्थ को रिश्तों से ऊपर रख देता है, तब विनाश निश्चित हो जाता है।
बृजेश चाहता तो वैधानिक रास्ता चुन सकता था।
वह अपने वैवाहिक जीवन की समस्याओं का समाधान कानून और बातचीत के माध्यम से खोज सकता था।
लेकिन उसने आसान रास्ता समझकर अपराध का रास्ता चुना।
और वही रास्ता अंततः उसके अपने जीवन को भी अंधकार में ले गया।
मल्लिका अब इस दुनिया में नहीं थी।
लेकिन उसकी कहानी लंबे समय तक लोगों को यह याद दिलाती रही कि विश्वासघात, लालच और स्वार्थ से शुरू हुई कहानी का अंत अक्सर अदालत, जेल और बर्बाद परिवारों पर जाकर होता है।
और यही इस दुखद कहानी की सबसे बड़ी सीख थी।
समाप्त
