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वर्ष 2014 का आजमगढ़ चार बड़े अपराधियों अमरजीत त्रिपाठी, चंगेज खान, अनल सिंह, और अतीक अंसारी के आतंक से त्राहि त्राहि कर रहा था। छीना झपटी, लूटपाट, तश्करी, डकैती, किडनैपिंग, मर्डर! और भी जाने क्या क्या।
जिले से अमन चैन पूरी तरह गायब था, हर तरफ खौफ का साम्राज्य दिखाई दे रहा था, कब किसकी बारी आ जाए कहना मुहाल था। पुलिस तमाशा देख रही थी, आम जनता पिस रही थी और अपराधी फल फूल रहे थे।
ऐेसे में नये एसपी सुखवंत सिंह का आगमन आजमगढ़ की जनता के लिए किसी सुखद संदेश से कम नहीं था। लोगों की उम्मीदें तब और बढ़ गयीं जब एसपी ने कार्यभार संभालते के साथ ही मुजरिमों को चुन चुनकर खत्म करना शुरू कर दिया।
मगर अराध्या राजपूत और दरोगा अनुराग पांडे दो ऐसे नाम थे जिन्होंने जल्दी ही एसपी का खेल भाप लिया। उन्हें यकीन आ गया कि अपराधियों के खिलाफ वह जो कुछ भी कर रहा था वो ना सिर्फ नपा तुला था बल्कि जिले के सबसे बड़े अपराधी अतीक अंसारी के साथ उसने हाथ भी मिला लिया था।
और वह बात दोनों को ही नामंजूर थी, क्योंकि अतीक अंसारी का पुर्जा पुर्जा कर देने के लिए दृढ़ संकल्पित थे। ऐसे में मामले ने जल्दी ही त्रिकोण का रूप अख्तियार कर लिया। एक ऐसा त्रिकोण जिसके हर सिरे पर मौत खड़ी थी।
एक कोना अपराधियों के कब्जे में था, दूसरे पर एसपी सुखवंत सिंह और उसकी टीम खड़ी थी, तो तीसरे पर दरोगा अनुराग पांडे और अराध्या राजपूत मौजूद थे, ऐसे में हाहाकार तो मचना ही था, मचा भी, इतना भयंकर मंजर सामने आया जो आजमगढ़ की जनता ने पहले तो शायद ही कभी देखा होगा।
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