ट्रेन के हॉर्न की कानों को बेधती सी आवाज सबको सुनाई देने लगी, जो निरंतर करीब आती जा रही थी।
बनर्जी ने विंडो ग्लास थोड़ा सा डाउन किया और अपने कान उस आवाज पर टिका दिये, और जब उन्हें लगा कि ट्रेन वहां पहुंचने वाली थी तो गाड़ी का दरवाजा खोलकर नीचे उतर गये।
हड़बड़ाया सा गंगेश भी बाहर निकल आया।
‘‘क्या हुआ दादा?’’
‘‘तुम यहीं रुको, हम अभी आते हैं।’’
‘‘जा कहां रहे हैं?’’
‘‘ट्रेन को करीब से देखना है, बहुत दिन हो गये हैं। लेकिन तुम यहां से हिलना मत।’’ कहकर वह तेजी से आगे को बढ़ चले, एक बार फिर उन्हें सलाम करने वालों का ताता लग गया, मगर जवाब उन्होंने किसी को भी देने की कोशिश नहीं की। फिर देखते ही देखते वह बैरियर के नीचे से गुजरकर उस पार पहुंच गये।
गंगेश की आंखें सिकुड़ सी गयीं, फिर आशुतोष की कही बात उसके कानों में गूंज उठी, ‘इस लिफाफे को तब खोलना जब मैं इस दुनिया में न रहूं।’
उसके जेहन में धमाका सा हुआ। अगले ही पल वह वाहनों के बीच से गुजरता हुआ बैरियर की तरफ दौड़ा।
गंगेश इस वक्त बुरी तरह बौखलाया हुआ था, इसलिए जल्दीबाजी में दो बाईक सवारों को दायें बायें धकेल दिया, तीन पैदल यात्रियों को नीचे गिरा दिया।
तब तक दाईं तरफ से वहां पहुंचती ट्रेन दिखाई भी देने लगी थी।
आगे कई दिल दहला देने वाली घटनायें एक साथ घटित हुईं।
ट्रेन के करीब आते ही आशुतोष बनर्जी रेलवे ट्रेक के बीच जा खड़े हुए। कमर में खुंसा लिफाफा उन्होंने दूर उछाल दिया। गंगेश बैरियर जम्प कर के उनकी तरफ झपटा। आशुतोष ने वहां मौजूद लोगों की तरफ देखकर मुस्कराते हुए हाथ हिलाया।
‘ट्रेन आ रही है राजा साहब….’
‘‘हट जाईये वहां से….’
‘जल्दी कीजिए….’
वहां मौजूद तमाम लोग गला फाड़कर चींखने लगे।
गंगेश ने बला की फुर्ती दिखाते हुए आशुतोष का हिलता हुआ हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचा, उसी वक्त ट्रेन उनके सिर पर पहुंच गयी। इंजन का इस तरफ का हिस्सा गंगेश के हाथ से टकराया, जोर का झटका लगा और राजा साहब का हाथ उसकी पकड़ से निकल गया। नीचे गिरता हुआ वह इंजन के आखिरी हिस्से से टकराया, उसकी दाईं कलाई ट्रैक पर पहुंची और कटकर अलग हो गयी। जिस्म उछलकर दूर जा गिरा, जबकि राजा साहब तो किसी को दिखाई ही नहीं दे रहे थे।


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