‘द कॉन्टिनेंटल‘ एक ऐसा होटल था, जहां गेट कीपर से लेकर मालिक तक सब नोन क्रिमिनल थे। ड्रग्स, हथियार, ह्यूमन ट्रैफिकिंग, मनी लांड्रिंग! मतलब ऐसा कोई गैरकानूनी धंधा नहीं था जिसमें उन लोगों ने अपने पांव न पसार रखे हों। कोढ़ में खाज ये कि उन्हें एक ऐसी राजनैतिक पार्टी का संरक्षण प्राप्त था, जिसका पोषण खुद देश की मिलेट्री कर रही थी। ऐसे हद से ज्यादा खतरनाक लोगों के साथ टकराना कम से कम किसी अकेले पुलिस ऑफिसर के बस की बात को हरगिज भी नहीं थी, और ऑफिसर भी कैसा? जो अपने 15 साल के बेटे की तलाश में भटकता हुआ इंडिया से म्यांमार जा पहुंचा था। टकराव फिर भी होकर रहा, एक और सौ के बीच जंग छिड़ गयी, ऐसी जंग जिसके कोई मायने नहीं दिखाई दे रहे थे, जो पूरी तरह एकतरफा जान पड़ती थी। देखना तो बस ये था कि पराये मुल्क में सब इंस्पेक्टर शशांक हजारिका कितने दिनों तक सर्वाइव कर पाता था।

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